उत्तराखंड के प्रसिद्ध तीर्थस्थल बद्रीनाथ धाम के ऊपर मौजूद लटकते ग्लेशियरों को लेकर एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने चिंता बढ़ा दी है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, अगर बद्रीनाथ के ऊपर स्थित तीन हैंगिंग ग्लेशियरों में से सबसे संवेदनशील ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूटकर नीचे आता है, तो हिमस्खलन की चपेट में करीब 398 इमारतें, 2.66 किलोमीटर सड़कें, दो पुल, एक हेलीपैड और पार्किंग क्षेत्र आ सकते हैं। इस अध्ययन में भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) और ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ कैंब्रिज के वैज्ञानिक शामिल हैं।
यह शोध 28 अक्टूबर 2026 को अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका Landslides में प्रकाशित हुआ है। हालांकि वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि यह कंप्यूटर मॉडलिंग पर आधारित संभावित खतरे का आकलन है। इसका मतलब यह नहीं है कि ग्लेशियर अभी टूटने वाला है या बद्रीनाथ में तत्काल हिमस्खलन का खतरा पैदा हो गया है।
अब तक क्या सामने आया?
- अध्ययन का क्षेत्र: उत्तराखंड के चमोली जिले में बद्रीनाथ कस्बे के ऊपर स्थित तीन हैंगिंग ग्लेशियर।
- ग्लेशियरों की ऊंचाई: समुद्र तल से लगभग 4,700 से 5,465 मीटर।
- सबसे संवेदनशील स्थान: अध्ययन में पहचाना गया दूसरा ग्लेशियर स्थल (Site 2)।
- संभावित प्रभाव: करीब 398 इमारतें, 2.66 किलोमीटर परिवहन मार्ग, दो पुल, हेलीपैड और पार्किंग क्षेत्र।
- अध्ययन की प्रकृति: सैटेलाइट डेटा और कंप्यूटर सिमुलेशन पर आधारित संभावित जोखिम का आकलन।
- महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण: यह ग्लेशियर टूटने की तत्काल चेतावनी नहीं है।
बद्रीनाथ के ऊपर तीन लटकते ग्लेशियरों पर हुई रिसर्च
शोधकर्ताओं ने बद्रीनाथ कस्बे के आसपास स्थित तीन हैंगिंग ग्लेशियरों का अध्ययन किया। ये ग्लेशियर समुद्र तल से 4,700 से 5,465 मीटर की ऊंचाई के बीच स्थित हैं। वैज्ञानिकों ने हाई-रिजॉल्यूशन सैटेलाइट तस्वीरों और ऊंचाई से जुड़े डिजिटल मॉडल की मदद से इन ग्लेशियरों की स्थिति, ढलान और संभावित बर्फ के आयतन का आकलन किया।
इसके बाद RAMMS (Rapid Mass Movement Simulation) नाम के कंप्यूटर मॉडल की मदद से यह समझने की कोशिश की गई कि अगर ग्लेशियर का बर्फीला हिस्सा टूटकर नीचे आए, तो वह किस रास्ते से आगे बढ़ सकता है और कस्बे के किन हिस्सों तक पहुंच सकता है।
इस शोध का शीर्षक Vulnerability assessment of hanging-glacier avalanches in Badrinath Township, Central Himalayas, India है। इसमें IISc बेंगलुरु, DRDO के Defence Geoinformatics Research Establishment और यूनिवर्सिटी ऑफ कैंब्रिज के शोधकर्ता शामिल हैं।
दूसरा ग्लेशियर सबसे ज्यादा संवेदनशील क्यों?
अध्ययन में शामिल तीन स्थानों में दूसरा ग्लेशियर (Site 2) सबसे अधिक जोखिम वाला पाया गया। शोधकर्ताओं के अनुमान के अनुसार, इसमें लगभग 53.2 लाख घन मीटर बर्फ मौजूद हो सकती है। इसकी सतह का ढलान करीब 34.57 डिग्री बताया गया है।
मॉडलिंग के सबसे खराब संभावित परिदृश्य में इस ग्लेशियर के टूटने से बर्फ और मलबे का तेज बहाव नीचे की ओर आ सकता है। सिमुलेशन में इसकी अधिकतम गति लगभग 78.5 मीटर प्रति सेकंड और बहाव की ऊंचाई करीब 73.5 मीटर तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया। ये आंकड़े मॉडल के परिणाम हैं, किसी वास्तविक घटना में दर्ज गति या ऊंचाई नहीं।
शोध के मुताबिक, इस संभावित बहाव से बद्रीनाथ कस्बे की करीब 398 इमारतें और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा प्रभावित क्षेत्र में आ सकते हैं।
कौन-कौन सी इमारतें और सुविधाएं आ सकती हैं चपेट में?
अध्ययन के सबसे खराब संभावित परिदृश्य में केवल रिहायशी इमारतें ही नहीं, बल्कि बद्रीनाथ की कई महत्वपूर्ण सुविधाएं भी संभावित प्रभाव क्षेत्र में शामिल हैं। इनमें शामिल हैं:
- करीब 398 मकान, होटल और अन्य इमारतें।
- लगभग 2.66 किलोमीटर सड़क और परिवहन से जुड़ा बुनियादी ढांचा।
- दो पुल।
- एक हेलीपैड।
- पार्किंग क्षेत्र।
- लगभग 3.87 हेक्टेयर कृषि भूमि।
- करीब 15.57 हेक्टेयर वन क्षेत्र।
इन आंकड़ों का अर्थ यह है कि सिमुलेशन में इन स्थानों को संभावित हिमस्खलन के प्रभाव क्षेत्र में पाया गया। इसका मतलब यह नहीं है कि ग्लेशियर टूटने पर ये सभी इमारतें और सुविधाएं निश्चित रूप से नष्ट हो जाएंगी।
क्या बद्रीनाथ मंदिर पर भी है सीधा खतरा?
अध्ययन से जुड़ी एक महत्वपूर्ण बात यह है कि मॉडलिंग के अनुसार बद्रीनाथ धाम का मुख्य मंदिर सीधे हिमस्खलन के बहाव की चपेट में आने की आशंका नहीं है। हालांकि, वैज्ञानिकों ने यह भी बताया है कि ग्लेशियर टूटने के साथ आने वाली चट्टानें और मलबा मंदिर के आसपास के क्षेत्र को प्रभावित कर सकते हैं।
इसलिए मंदिर के सीधे बहाव क्षेत्र में नहीं आने को पूरी सुरक्षा की गारंटी नहीं माना जा सकता। आसपास के क्षेत्र में मलबे और अन्य द्वितीयक प्रभावों की आशंका को भी आपदा प्रबंधन की योजना में शामिल करना जरूरी है।
हैंगिंग ग्लेशियर क्या होते हैं और कैसे पैदा करते हैं खतरा?
हैंगिंग ग्लेशियर यानी लटकते ग्लेशियर ऐसे बर्फीले भंडार होते हैं, जो पहाड़ों की खड़ी ढलानों पर स्थित रहते हैं और घाटी के तल से सीधे जुड़े नहीं होते। इनका कुछ हिस्सा चट्टानी ढलानों या खड़ी पहाड़ी किनारों पर टिका होता है।
जब बर्फ की स्थिरता कम होती है या ग्लेशियर का कोई हिस्सा टूटकर अलग हो जाता है, तो वह तेज गति से नीचे गिर सकता है। इस तरह की घटना से हिमस्खलन पैदा हो सकता है। बर्फ के साथ चट्टानें, मिट्टी और अन्य मलबा भी नीचे आ सकता है, जिससे रास्ते में मौजूद बस्तियों और बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचने की आशंका रहती है।
शोध में यह भी बताया गया है कि ग्लेशियरों के तापीय और भौतिक बदलाव उनकी स्थिरता को प्रभावित कर सकते हैं। तापमान बढ़ने और बर्फ के आधार पर पकड़ कमजोर होने जैसी परिस्थितियां बर्फ के अलग होने की आशंका बढ़ा सकती हैं।
वैज्ञानिकों ने क्या उपाय सुझाए?
शोधकर्ताओं ने बद्रीनाथ जैसे संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों में संभावित आपदा के प्रभाव को कम करने के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाने की जरूरत बताई है:
- खतरे वाले क्षेत्रों की मैपिंग: संभावित हिमस्खलन के रास्तों और प्रभाव क्षेत्र की पहचान कर स्पष्ट नक्शे तैयार किए जाएं।
- निगरानी व्यवस्था: संवेदनशील ग्लेशियरों की स्थिति पर नियमित नजर रखी जाए और आधुनिक मॉनिटरिंग सिस्टम विकसित किए जाएं।
- अर्ली वार्निंग सिस्टम: संभावित खतरे की स्थिति में स्थानीय लोगों, यात्रियों और प्रशासन तक समय पर सूचना पहुंचाने की व्यवस्था हो।
- निर्माण पर नियंत्रण: संभावित प्रभाव क्षेत्रों में नए निर्माण और बुनियादी ढांचे की योजना बनाते समय जोखिम को ध्यान में रखा जाए।
- आपदा प्रबंधन की तैयारी: स्थानीय लोगों और तीर्थयात्रियों को आपात स्थिति में सुरक्षित स्थानों और निकासी मार्गों की जानकारी दी जाए।
वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तरह के अध्ययन का इस्तेमाल दूसरे हिमालयी कस्बों में भी ग्लेशियर से जुड़े जोखिमों का आकलन करने के लिए किया जा सकता है।
क्या बद्रीनाथ में अभी तत्काल हिमस्खलन का खतरा है?
इस सवाल का जवाब समझना बेहद जरूरी है। अध्ययन में ग्लेशियर टूटने की कोई निश्चित तारीख या तत्काल चेतावनी नहीं दी गई है। वैज्ञानिकों ने सैटेलाइट डेटा और कंप्यूटर मॉडल के आधार पर यह अनुमान लगाया है कि अगर किसी ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूटता है, तो संभावित बहाव किस क्षेत्र तक पहुंच सकता है।
इसके अलावा बर्फ की मोटाई और संभावित रिलीज वॉल्यूम का अनुमान रिमोट सेंसिंग और मॉडल पर आधारित है, प्रत्यक्ष फील्ड माप पर नहीं। अध्ययन में घर्षण से जुड़े पैरामीटर और बहाव के व्यवहार को लेकर अनिश्चितताओं का भी उल्लेख किया गया है। इसलिए वास्तविक घटना का आकार और प्रभाव मॉडल के अनुमान से अलग हो सकता है।
निष्कर्ष
बद्रीनाथ के ऊपर मौजूद हैंगिंग ग्लेशियरों पर हुए नए अध्ययन ने हिमालयी क्षेत्रों में आपदा जोखिम को लेकर महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं। सबसे खराब संभावित स्थिति में करीब 398 इमारतों, सड़कों, पुलों, हेलीपैड और अन्य सुविधाओं के प्रभावित होने का अनुमान है। हालांकि, यह तत्काल ग्लेशियर टूटने की चेतावनी नहीं है। अध्ययन का मुख्य संदेश है कि संवेदनशील क्षेत्रों की निगरानी, खतरे की मैपिंग, निर्माण पर नियंत्रण और समय रहते आपदा प्रबंधन की तैयारी जरूरी है।
प्रमुख स्रोत:
डिस्क्लेमर: यह लेख 1 नवंबर 2026 तक प्रकाशित वैज्ञानिक अध्ययन और मीडिया रिपोर्टों पर आधारित है। इसमें दिए गए नुकसान के आंकड़े संभावित परिदृश्य के कंप्यूटर सिमुलेशन हैं, वास्तविक घटना की भविष्यवाणी या तत्काल आपदा चेतावनी नहीं।





























