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Home - News - “बच्चों को प्यार और संवाद दें”: नई पीढ़ी के भविष्य पर मोहन भागवत का बड़ा संदेश

“बच्चों को प्यार और संवाद दें”: नई पीढ़ी के भविष्य पर मोहन भागवत का बड़ा संदेश

दिल्ली में आयोजित विश्व मंगलम् सभा में आरएसएस प्रमुख ने कहा कि बच्चों को डांटने के बजाय उन्हें समझना और उनके सवालों का जवाब देना समाज की जिम्मेदारी है।

Abhay Jeet Singh by Abhay Jeet Singh
25/07/2026
in News, Political News
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मोहन भागवत बच्चों को प्यार दें

मोहन भागवत: बच्चों को प्यार और संवाद दें

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“बच्चों को प्यार और संवाद दें”: नई पीढ़ी के भविष्य पर मोहन भागवत का बड़ा संदेश

नई दिल्ली (भारती Fast News संपादकीय डेस्क)। स्क्रीन की दुनिया में सिमटती जा रही नई पीढ़ी और परिवारों के बीच घटते संवाद पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने एक अत्यंत विचारणीय और गंभीर संदेश दिया है। राजधानी दिल्ली में आयोजित ‘विश्व मंगलम् सभा’ के मंच से देश के करोड़ों अभिभावकों और समाज के विचारकों को संबोधित करते हुए संघ प्रमुख ने स्पष्ट कहा कि बच्चों पर अपनी इच्छाएं थपने या छोटी-छोटी बातों पर डांटने के बजाय मोहन भागवत बच्चों को प्यार दें और उनसे पारिवारिक संवाद बढ़ाने का मूल मंत्र दिया।

डिजिटल दौर में जहां बच्चे अवसाद, अकेलेपन और मोबाइल स्क्रीन के एडिक्शन का शिकार हो रहे हैं, वहां आरएसएस प्रमुख का यह वक्तव्य केवल एक नैतिक उपदेश नहीं, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को टूटने से बचाने की एक समयोचित पुकार है। उन्होंने रेखांकित किया कि आने वाले दशक में भारत का वैश्विक नेतृत्व इस बात पर निर्भर करेगा कि हमारी नई पीढ़ी को घरों के भीतर कैसा वातावरण और संस्कार मिल रहे हैं।

मुख्य बिंदु (Key Highlights)

  • डांट नहीं, संवाद का रास्ता: मोहन भागवत ने स्पष्ट कहा कि बच्चों की गलतियों पर डांटने या दंडित करने से उनके भीतर डर और अलगाव पैदा होता है; सही रास्ता धैर्यपूर्वक संवाद स्थापित करने का है।

  • पारिवारिक वातावरण का महत्व: बच्चे जो सुनते हैं उससे ज्यादा वह सीखते हैं जो अपने घर में माता-पिता को करते हुए देखते हैं।

  • डिजिटल दूरी और भौतिक जुड़ाव: स्क्रीन टाइम घटाने के लिए बच्चों को जबरन रोकने के बजाय उनके साथ गुणवत्तापूर्ण समय (Quality Time) बिताने की जरूरत है।

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  • जिज्ञासा का सम्मान: बच्चों के मन में उठने वाले अनगिनत प्रश्नों को दबाने के बजाय उनके सही और तर्कसंगत उत्तर देना समाज और परिवार की जिम्मेदारी है।

  • भारतीय परिवार व्यवस्था: संघ प्रमुख ने विश्व मंगलम् सभा में कहा कि मजबूत परिवार ही एक मजबूत, आत्मनिर्भर और अनुशासित राष्ट्र की सबसे बड़ी बुनियाद होते हैं।

  • संस्कार और आधुनिकता का संतुलन: उन्होंने युवाओं को तकनीक से जोड़ने के साथ-साथ अपनी जड़ों, संस्कृति और नैतिक मूल्यों से मजबूती से बंधे रहने का आह्वान किया।

ताज़ा अपडेट: विश्व मंगलम् सभा में क्या बोले संघ प्रमुख?

नई दिल्ली में आयोजित ‘विश्व मंगलम् सभा’ में देश भर से आए प्रबुद्धजनों, शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मौजूदगी में मोहन भागवत ने आज के परिवेश में बच्चों के मानसिक विकास पर गहरा प्रकाश डाला।

संबोधन के दौरान उन्होंने कहा कि मोहन भागवत बच्चों को प्यार दें और उन्हें समझने की वकालत करते हैं, क्योंकि आज का बच्चा ज्ञान की कमी से नहीं, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव (Emotional Connection) की कमी से जूझ रहा है। उन्होंने रेखांकित किया कि जब माता-पिता काम के दबाव में बच्चों को समय नहीं दे पाते, तो बच्चे उस खालीपन को डिजिटल दुनिया या गलत संगत में भरने की कोशिश करते हैं।

Interesting Fact (रोचक तथ्य): दुनिया भर के बाल मनोवैज्ञानिक (Child Psychologists) भी अब मान चुके हैं कि 12 वर्ष की उम्र तक बच्चों के चरित्र और निर्णय लेने की क्षमता का 80% हिस्सा उनके पारिवारिक माहौल और माता-पिता के आचरण से तय होता है।

पृष्ठभूमि: आधुनिक दौर में घटता पारिवारिक संवाद

पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ते शहरीकरण, न्यूक्लियर फैमिली (एकल परिवार) कल्चर और अत्यधिक स्क्रीन निर्भरता ने भारतीय परिवार प्रणाली के ढांचे को काफी हद तक प्रभावित किया है। पहले जहां दादा-दादी और नाना-नानी की कहानियां बच्चों को नैतिक मूल्य सिखाती थीं, वहीं आज बच्चे अधिकांश समय स्मार्टफोन या गेमिंग कंसोल पर बिता रहे हैं।

इसी पृष्ठभूमि में संघ प्रमुख का यह बयान काफी प्रासंगिक हो जाता है। उन्होंने कहा कि संस्कार बाजार में या गूगल सर्च पर नहीं मिलते; वे घर की रसोई, भोजन की मेज और माता-पिता के साथ बिताए गए आत्मीय पलों में पनपते हैं। जब बच्चा खुद को असुरक्षित या अनसुना महसूस करता है, तब उसका व्यवहार आक्रामक या अत्यधिक एकांतप्रिय होने लगता है।

क्या हुआ कार्यक्रम में? वक्तव्य का विस्तृत सार

विश्व मंगलम् सभा के दौरान जब संघ प्रमुख मंच पर पहुंचे, तो उन्होंने सीधे तौर पर आधुनिक जीवनशैली में आ रहे भावनात्मक संकट पर बात शुरू की:

[विश्व मंगलम् सभा - मोहन भागवत के भाषण के मुख्य चरण]

1. पारिवारिक संवाद की पुनर्रचना ──> भोजन की मेज पर कम से कम एक समय पूरा परिवार बिना मोबाइल के बैठे।
2. प्रश्नों का तार्किक समाधान ──> बच्चों के कठिन प्रश्नों से भागें नहीं; उन्हें तर्क और प्यार से समझाएं।
3. सकारात्मक प्रोत्साहन ──> तुलनात्मक प्रतिस्पर्धा (Comparison) से बच्चों को बचाएं।
4. सामाजिक उत्तरदायित्व ──> बच्चे केवल अपने करियर के बारे में न सोचें, समाज के प्रति भी संवेदनशील बनें।

उन्होंने कहा, “यदि हम चाहते हैं कि हमारी आने वाली पीढ़ी अनुशासित, देशभक्त और चरित्रवान बने, तो हमें पहले अपने व्यवहार में वही गुण ढालने होंगे। यदि पिता स्वयं मोबाइल पर लगा रहेगा, तो वह बच्चे को किताब पढ़ने के लिए प्रेरित नहीं कर सकता।”

Reader Alert (अभिभावकों के लिए ध्यान देने योग्य बात): यदि आपका बच्चा अचानक चुप रहने लगा है, चिड़चिड़ा हो रहा है या पढ़ाई से दूरी बना रहा है, तो उस पर गुस्सा करने के बजाय उससे दोस्त की तरह बात करें। अक्सर बच्चे अपनी समस्या सीधे नहीं बता पाते।

विशेषज्ञ विश्लेषण: समाजशास्त्रियों और शिक्षाविदों की राय

मोहन भागवत के इस बयान को देश के प्रतिष्ठित समाजशास्त्रियों और बाल विकास विशेषज्ञों ने बेहद प्रासंगिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित बताया है।

शिक्षा विशेषज्ञों और बाल मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि:

“आरएसएस प्रमुख का यह संदेश कि मोहन भागवत बच्चों को प्यार दें और उनसे सकारात्मक संवाद स्थापित करें, आधुनिक पैरेंटिंग साइंस (Modern Parenting Science) के बिल्कुल अनुकूल है। जब बच्चों को उनके घर में बिना किसी शर्त के स्वीकार किया जाता है और उनकी बात सुनी जाती है, तो उनके अंदर आत्म-विश्वास (Self-esteem) का स्तर कई गुना बढ़ जाता है। डांट-डपट से बच्चे आज्ञाकारी नहीं बनते, बल्कि केवल डरना सीख जाते हैं।”

विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि भारतीय समाज में ‘ऑथोरिटेरियन पैरेंटिंग’ (अत्यधिक कड़ा अनुशासन) के स्थान पर ‘अथॉरिटेटिव पैरेंटिंग’ (प्यार और स्पष्ट सीमाओं का संतुलन) को अपनाने की सख्त जरूरत है।

आधिकारिक जानकारी और मुख्य संदेश

विश्व मंगलम् सभा की आयोजक समिति द्वारा जारी विज्ञप्ति के अनुसार, संघ प्रमुख ने भाषण में परिवार, समाज और राष्ट्र निर्माण के अंतर्संबंधों को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया।

विषय / क्षेत्रसंघ प्रमुख का संदेश / निर्देश
पैरेंटिंग दृष्टिकोणडांटने और सजा देने के स्थान पर समझ और संवाद अपनाएं।
स्क्रीन टाइम प्रबंधनबंदिशें लगाने से बेहतर है बच्चों को मैदानी खेल और कला से जोड़ना।
पारिवारिक मूल्यसप्ताह में कम से कम एक बार पूरा परिवार बैठकर सामूहिक चर्चा करे।
शिक्षा और संस्कारकेवल डिग्री पाना सफलता नहीं; नैतिक चरित्र ही असली संपत्ति है।
सामाजिक भूमिकापड़ोस और समाज के अन्य बच्चों के प्रति भी संवेदनशीलता रखें।

नई पीढ़ी और छात्रों पर इसका सीधा असर

इस संदेश का सबसे गहरा और सीधा प्रभाव आज के छात्रों और युवा पीढ़ी पर पड़ता है।

  1. मानसिक तनाव से मुक्ति: जब माता-पिता अंकों (Marks) और रैंक के आधार पर बच्चों का आकलन करना बंद कर देंगे, तो छात्रों पर से पढ़ाई का अनावश्यक मानसिक दबाव हटेगा।

  2. आत्मविश्वास में वृद्धि: जब बच्चों की जिज्ञासाओं और प्रश्नों का उत्तर घर में प्यार से मिलेगा, तो वे बाहर किसी गलत या भ्रामक स्रोत का सहारा नहीं लेंगे।

  3. डिजिटल डिटॉक्स की प्रेरणा: घर में अगर संवाद का जीवंत माहौल होगा, तो बच्चे स्वयं ही मोबाइल और सोशल मीडिया से दूरी बनाने लगेंगे।

Expert View (विशेषज्ञ विचार): “आज के दौर का सबसे बड़ा संकट संवादहीनता (Communication Gap) है। संघ प्रमुख ने सही समय पर समाज की सबसे कमजोर नस पर हाथ रखा है।” – (वरिष्ठ समाजशास्त्री)

भविष्य का प्रभाव: समाज और परिवार पर क्या असर पड़ेगा?

यदि संघ प्रमुख द्वारा दी गई इस सलाह को समाज और परिवार व्यापक रूप से अपनाते हैं, तो आने वाले समय में इसके दूरगामी और सकारात्मक परिणाम देखने को मिलेंगे:

  • मजबूत पारिवारिक ढांचा: टूटते हुए परिवारों और वृद्ध आश्रमों की बढ़ती संख्या पर अंकुश लगेगा, क्योंकि बच्चे बचपन से ही अपनों के प्रति सम्मान और संवेदना सीखेंगे।

  • अपराध और नशे की आदतों में कमी: शोध बताते हैं कि जिन बच्चों को घर में पर्याप्त प्यार और ध्यान मिलता है, उनके भटकने या नशे जैसी आदतों में पड़ने की आशंका 70% तक कम हो जाती है।

  • संस्कारयुक्त भावी नागरिक: एक संतुलित, शांत और संवेदी वातावरण में पले-बढ़े बच्चे आगे चलकर जिम्मेदार और राष्ट्रप्रेमी नागरिक बनेंगे।

अभिभावकों और नागरिकों को अब क्या करना चाहिए?

  • दैनिक संवाद का नियम बनाएं: रोज रात को सोने से पहले कम से कम 20 मिनट अपने बच्चों के साथ उनके दिनभर के अनुभवों पर बिना किसी आलोचना के बात करें।

  • धैर्य से सुनें: जब बच्चा कोई सवाल पूछे, तो उसे “अभी समय नहीं है” कहकर न टालें। यदि उत्तर नहीं पता, तो साथ मिलकर उत्तर ढूंढने का प्रयास करें।

  • अपनी इच्छाएं न थपें: बच्चा क्या बनना चाहता है, उसकी रुचि किसमें है—इसे समझें और उसका समर्थन करें।

  • मॉडल बिहेवियर अपनाएं: आप जैसा व्यवहार अपने बच्चों में देखना चाहते हैं, पहले स्वयं वैसा ही आचरण घर में करें।

निष्कर्ष (Conclusion)

विश्व मंगलम् सभा के मंच से मोहन भागवत द्वारा दिया गया यह संदेश आधुनिक भारत के लिए एक दिशा-निर्देश की तरह है। जब वे कहते हैं कि मोहन भागवत बच्चों को प्यार दें और उनसे जुड़ाव बनाएं, तो उनका तात्पर्य यह है कि बिना प्रेम और आत्मीयता के कोई भी समाज या राष्ट्र महान नहीं बन सकता।

सजा और सख्त अनुशासन से अस्थायी नियंत्रण तो मिल सकता है, लेकिन स्थायी मूल्य केवल प्रेम, सहानुभूति और सतत संवाद से ही निर्मित होते हैं। अब यह हर माता-पिता, शिक्षक और समाज के नागरिक का कर्तव्य है कि वे इस संदेश को अपने जीवन में उतारें और अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए एक सुरक्षित, खुशहाल और मूल्य- आधारित वातावरण का निर्माण करें।

Bharati Fast News की सलाह: समाज, संस्कृति और राष्ट्र निर्माण से जुड़ी ऐसी ही विचारोत्तेजक और सटीक रिपोर्टिंग के लिए हमारे साथ बने रहें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1. मोहन भागवत ने विश्व मंगलम् सभा में बच्चों को लेकर क्या मुख्य संदेश दिया?

उत्तर: संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि बच्चों को डांटने या दंडित करने के बजाय उन्हें प्यार, समझ और तार्किक संवाद देना चाहिए ताकि उनका मानसिक और नैतिक विकास सही दिशा में हो सके।

Q2. मोहन भागवत के अनुसार बच्चों के स्क्रीन टाइम को कैसे नियंत्रित किया जाए?

उत्तर: उन्होंने कहा कि केवल बंदिशें लगाने से काम नहीं चलेगा। माता-पिता को स्वयं मोबाइल छोड़कर बच्चों के साथ समय बिताना होगा और उन्हें मैदानी खेलों व व्यावहारिक गतिविधियों से जोड़ना होगा।

Q3. यह कार्यक्रम कहाँ आयोजित हुआ था?

उत्तर: यह महत्वपूर्ण संबोधन नई दिल्ली में आयोजित ‘विश्व मंगलम् सभा’ के मंच से दिया गया, जिसमें देश भर के प्रबुद्धजन शामिल हुए थे।

Q4. बच्चों के प्रश्नों पर संघ प्रमुख का क्या दृष्टिकोण था?

उत्तर: उन्होंने स्पष्ट किया कि बच्चों के मन में उठने वाले हर सवाल का तार्किक और संतोषजनक उत्तर दिया जाना चाहिए। उनकी जिज्ञासा को दबाना उनके बौद्धिक विकास को रोकने जैसा है।

Q5. आधुनिक पैरेंटिंग में यह संदेश क्यों महत्वपूर्ण है?

उत्तर: आज के डिजिटल युग में बच्चे अकेलेपन और अवसाद का शिकार हो रहे हैं। ऐसे में पारिवारिक संवाद और प्यार ही उन्हें मानसिक रूप से मजबूत और सुरक्षित महसूस करा सकता है।

Q6. क्या इस संबोधन में पारिवारिक मूल्यों पर भी बात हुई?

उत्तर: जी हां, उन्होंने भारतीय संयुक्त परिवार प्रणाली और पारिवारिक संस्कारों को राष्ट्र निर्माण की पहली और सबसे महत्वपूर्ण सीढ़ी बताया।

Q7. अभिभावकों को बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करने की सलाह दी गई है?

उत्तर: अभिभावकों को सलाह दी गई है कि वे तानाशाह (Authoritarian) बनने के बजाय बच्चों के मित्र और मार्गदर्शक बनें और उनकी तुलना दूसरों से न करें।

Q8. इस संदेश का समाज पर क्या दूरगामी प्रभाव पड़ेगा?

उत्तर: इससे परिवारों में संवादहीनता खत्म होगी, बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य सुधरेगा और समाज में अपराध व भटकाव की प्रवृत्तियों में कमी आएगी।

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Disclaimer: यह समाचार रिपोर्ट ‘विश्व मंगलम् सभा’ में दिए गए सार्वजनिक भाषण, आधिकारिक बयानों और सामाजिक विश्लेषणों पर आधारित है। भारती Fast News निष्पक्ष, तथ्य-आधारित और विचारोत्तेजक पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्ध है।

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Abhay Jeet Singh

Abhay Bharati Fast News में लेखक एवं संपादक के रूप में कार्यरत हैं। ये टेक्नोलॉजी, मनोरंजन, खेल और सामयिक घटनाओं से संबंधित विषयों पर समाचार लेखन और संपादन का कार्य करते हैं।इनकी जिम्मेदारी विश्वसनीय स्रोतों से जानकारी एकत्र करना, तथ्यों का सत्यापन करना तथा सामग्री की संपादकीय समीक्षा के बाद प्रकाशन सुनिश्चित करना है।भूमिका: Author & Editor – Bharati Fast News

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