CEC नियुक्ति मामला 2026 में नया मोड़
मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को चुनौती देने वाले मामले में सुप्रीम कोर्ट में बुधवार, 7 अक्टूबर 2026 को नया मोड़ आया। सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर में दिए गए विभाजित फैसले को वापस लेने की मांग वाली याचिका पर विचार करने की बात कही है।
यह मामला उस कानून की संवैधानिक वैधता से जुड़ा है, जिसके तहत CEC और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाली चयन समिति में मुख्य न्यायाधीश (CJI) की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल किया गया है।
जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा को लेकर क्या है आपत्ति?
23 सितंबर 2026 को जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की दो सदस्यीय पीठ ने इस मामले में अलग-अलग राय दी थी। मतभेद के कारण मामले को उपयुक्त बड़ी पीठ के सामने रखने के लिए CJI के समक्ष भेजा गया था।
अब एक याचिकाकर्ता ने जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की इस मामले में भागीदारी पर सवाल उठाया है। याचिका में दावा किया गया है कि सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने नहीं आया कि जस्टिस शर्मा के बेटे का चुनाव आयोग से पेशेवर जुड़ाव रहा है।
रिपोर्टों के अनुसार, जस्टिस शर्मा के बेटे मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में चुनाव आयोग के Standing Counsel के रूप में जुड़े रहे हैं। इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने संभावित हितों के टकराव और निष्पक्षता को लेकर आपत्ति उठाई है।
आरोप क्या है?
यह ध्यान रखना जरूरी है कि हितों के टकराव का आरोप याचिकाकर्ता की ओर से लगाया गया है। उपलब्ध रिपोर्टों में ऐसा कोई अंतिम न्यायिक निष्कर्ष सामने नहीं आया है कि जस्टिस शर्मा ने वास्तव में किसी पक्षपातपूर्ण तरीके से फैसला दिया था।
याचिका में इसी कथित जानकारी के आधार पर सितंबर के विभाजित फैसले को वापस लेने अथवा उस पर पुनर्विचार की मांग की गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
7 अक्टूबर को वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष रिकॉल एप्लीकेशन का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि यह आवेदन 23 सितंबर के विभाजित फैसले को वापस लेने की मांग करता है।
इस पर CJI सूर्यकांत ने कहा कि अदालत आवेदन पर विचार करेगी और उसके बाद निर्णय लिया जाएगा। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने अभी विभाजित फैसला रद्द कर दिया है।
23 सितंबर के फैसले में क्या हुआ था?
CEC और EC की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने अलग-अलग राय दी थी।
जस्टिस शर्मा का मत था कि कानून की कुछ धाराओं की संवैधानिक वैधता से जुड़े महत्वपूर्ण सवालों पर संविधान पीठ द्वारा विचार किया जाना चाहिए। वहीं जस्टिस दत्ता ने बड़ी पीठ को संदर्भित करने की आवश्यकता से असहमति जताई थी। दोनों न्यायाधीशों के मत अलग होने के कारण मामला आगे की कार्रवाई के लिए CJI के समक्ष रखा गया।
विवाद का केंद्र 2023 का CEC नियुक्ति कानून
पूरा विवाद Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act, 2023 से जुड़ा है।
इस कानून के तहत CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए तीन सदस्यीय चयन समिति का प्रावधान है। इसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं।
इस व्यवस्था को लेकर याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इससे चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता को लेकर संवैधानिक सवाल पैदा होते हैं।
अब आगे क्या होगा?
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉल याचिका पर विचार करने की बात कही है, लेकिन उसे स्वीकार करने या सितंबर के फैसले को रद्द करने का कोई अंतिम आदेश नहीं दिया गया है।
इसके अलावा, एक अलग पक्ष की ओर से इस मामले में curative petition दाखिल किए जाने की जानकारी भी अदालत के समक्ष दी गई है। रिकॉल एप्लीकेशन और क्यूरेटिव याचिका अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं और दोनों पर आगे अलग-अलग निर्णय हो सकते हैं।
इसलिए CEC नियुक्ति मामला 2026 अब दो स्तरों पर महत्वपूर्ण हो गया है—एक तरफ 2023 के नियुक्ति कानून की संवैधानिक वैधता का सवाल है और दूसरी तरफ सितंबर के विभाजित फैसले में जस्टिस शर्मा की भागीदारी को लेकर उठाई गई आपत्ति पर सुप्रीम कोर्ट का अगला रुख।





























