भारत में 8,000 स्कूलों में शून्य नामांकन, फिर भी 20,000 शिक्षक तैनात
हाल ही में भारत शिक्षा मंत्रालय (Ministry of Education) द्वारा जारी 2024-25 के आंकड़ों में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है।
देश के लगभग 8,000 स्कूल ऐसे हैं जिनमें इस सत्र में एक भी छात्र नामांकित नहीं है, लेकिन इन स्कूलों में 20,817 शिक्षक नियुक्त हैं।
यह मुद्दा शिक्षा बजट, स्टाफिंग और सरकारी संसाधनों के सही उपयोग पर देशव्यापी सवाल उठा रहा है.
भारत में शिक्षा व्यवस्था की चुनौती: 8,000 स्कूलों में कोई छात्र नहीं, 20,000 शिक्षक हैं नियुक्त
किस राज्य में सबसे अधिक “शून्य नामांकन स्कूल”?
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार:
| राज्य | शून्य नामांकन स्कूल | नियुक्त शिक्षक |
|---|---|---|
| West Bengal | 3,812 | 17,965 |
| Telangana | 2,245 | 1,016 |
| Madhya Pradesh | 463 | 223 |
| Uttar Pradesh | 81 | Not specified |
वेस्ट बंगाल में सबसे ज्यादा – 3,812 स्कूल और 17,965 शिक्षक हैं, जिनमें कोई छात्र नामांकित नहीं हुआ।
तेलंगाना, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश भी इस आंकड़े में ऊपर हैं।
कुछ राज्यों जैसे हरियाणा, महाराष्ट्र, गोवा, असम, हिमाचल, छत्तीसगढ़, नगालैंड, सिक्किम और त्रिपुरा में एक भी ऐसा स्कूल नहीं है |

Union Territories में स्थिति कैसी?
दिल्ली, पुडुचेरी, लक्षद्वीप, दादरा नगर हवेली, अंडमान-निकोबार, दमण-दीव और चंडीगढ़ जैसे केंद्र शासित प्रदेशों में “शून्य नामांकन स्कूल” का कोई मामला नहीं आया है.
गिरता नामांकन: शिक्षा की गुणवत्ता या आबादी का संकट?
2024-25 सत्र में भारत के स्कूलों में कुल नामांकन 24.68 करोड़ रहा, जबकि यह 2022-23 में 25.18 करोड़ था — यानी दो साल में 50 लाख छात्रों की कमी।
विशेषज्ञों का कहना है कि जन्म दर गिरना, शहरीकरण, निजी स्कूलों की तरफ रुझान और कुछ इलाकों में आबादी पलायन इसका कारण है।
“ग्रोस एनरोलमेंट रेश्यो” का डेनोमिनेटर 2011 की जनगणना डाटा पर आधारित है, तो असली तस्वीर 2026 की अगली जनगणना के बाद स्पष्ट होगी।
इस गिरावट का असर एकल शिक्षक वाले स्कूलों पर भी दिखा — 1 लाख से अधिक स्कूलों में सिर्फ एक शिक्षक हैं.
शिक्षक बढ़े, छात्र घटे: यह विरोधाभास क्यों?
UDISE+ के मुताबिक देश में पहली बार शिक्षकों की संख्या 1 करोड़ पार कर गई है।
सरकारी स्कूलों में सिर्फ 41% छात्र पढ़ते हैं, बाकी प्राइवेट में हैं।
National Education Policy के अनुसार “प्यूपिल टीचर रेशिओ” 1:30 होना चाहिए, लेकिन अब foundational stage पर यह 1:10, preparatory पर 1:13, middle पर 1:17 और secondary पर 1:21 है — यानी सिस्टम में “टीचिंग रिसोर्स” बढ़ा जरूर, लेकिन छात्र नहीं हैं.
शून्य नामांकन स्कूलों में तैनात शिक्षकों के मुद्दे
सरकार अकेले इन स्कूलों पर ही हर महीने करोड़ों का वेतन खर्च करती है।
कई शिक्षक बिना किसी छात्र के स्कूल आ रहे हैं — पूरा दिन केवल उपस्थिति के लिए बिताते हैं।
ऐसे शिक्षक प्रशिक्षण, ट्रांसफर, समायोजन या अन्य प्रशासनिक कार्यों में लगाए जा सकते हैं, लेकिन अधिकांश राज्यों में अभी तक नीतिगत उपाय नहीं बने हैं।
राज्य सरकारों को स्कूलों को मर्ज (संयुक्त) करने, स्टाफ की तैनाती का पुनर्गठन करने और संसाधनों के सही उपयोग की सलाह दी गई है.
केंद्र का विश्लेषण और राज्यों को सलाह
Ministry of Education के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार:
“यह मुद्दा राज्यों की जिम्मेदारी है, स्कूल एजुकेशन स्टेट सब्जेक्ट है। हमने राज्यों को सलाह दी है — इन स्कूलों को मर्ज करें, आधारिक संरचना और स्टाफ का दोबारा समायोजन करें।”
राज्य सरकारें अब कम नामांकन वाले और बिना नामांकन वाले स्कूलों को बड़े स्कूलों से जोड़ रही हैं ताकि टीचिंग स्टाफ का उपयोग हो सके और फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर बेकार न हो।
साथ ही, कुछ राज्य “स्कूल ऑप्टिमाइजेशन पॉलिसी” लागू करने जा रहे हैं
“एकला शिक्षक” संकट: सिर्फ एक शिक्षक वाले 1 लाख स्कूल
भारत में 1 लाख से अधिक स्कूलों में सिर्फ “एक शिक्षक” हैं —
आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, झारखंड, महाराष्ट्र, कर्नाटक प्रमुख राज्यों में हैं।
इन स्कूलों में 33 लाख बच्चे पढ़ते हैं — शिक्षा की गुणवत्ता और लेर्निंग आउटकम एक बड़ी चुनौती है।
शिक्षा मंत्रालय ने निर्देश दिया:
“एकला शिक्षक वाले स्कूलों में जल्द से जल्द अतिरिक्त टीचर नियुक्त हों या स्कूलों का विलय किया जाये।”
क्या शून्य नामांकन के पीछे “स्कूल ऑप्टिमाइजेशन” है?
कई जिलों में छोटे, ग्रामीण स्कूल कम बच्चों की वजह से बंद किए जा रहे हैं; इनमें तैनात टीचर्स को दूसरे स्कूलों में समायोजित किया जा रहा है।
कुछ केसों में, शिक्षक “मल्टी-सेंटर टीचिंग” या नोडल स्कूलों में भेजे जा रहे हैं।
शिक्षा बजट पर असर और जनसंख्या बदलाव
– भारत का शिक्षा बजट सालाना 1.4 लाख करोड़ रुपये है, जिसमें टीचर सैलरी प्रमुख हिस्सा है।
– आबादी घटने पर स्कूल बंद करने या मर्ज किए जाने की जरूरत है, वरना बजट रिसोर्स सही जगह इस्तेमाल नहीं हो पाता।
– सरकार नई शिक्षा नीति में “फ्लेक्सिबल स्कूल इंफ्रास्ट्रक्चर” और “लीड स्कूल मॉडल” पर काम कर रही है।
सरकारी/प्राइवेट स्कूलों में एडमिशन ट्रेंड क्यों बदल रहा?
शहरी व ग्रामीण इलाकों में माता-पिता प्राइवेट स्कूलों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि सरकारी स्कूलों में सुविधाओं की कमी, एजुकेशन क्वालिटी का अंतर, और ज्यादा digital/English-focus ने private sector को बढ़ावा दिया है।
क्या करना चाहिए? समाधान और नीति सुझाव
राज्य/जिला स्तर पर शून्य नामांकन स्कूलों का “रीव्यू और ऑप्टिमाइजेशन” करें।
टॉप परफॉर्मिंग स्कूलों के साथ ऐसे स्कूलों को मर्ज करें।
टीचर्स का रश्कलिंग, डिजिटल ट्रेनिंग, अन्य सरकारी कार्यों में लगाया जाये।
बजट लॉस को रोकने के लिए स्कूल क्लोजर या विलय को प्राथमिकता दें।
Education Researchers का सुझाव है — स्कूल क्लोज करने से पहले स्थानीय जरूरत, बच्चों की मौजूदगी और गांव/ब्लॉक की जनसंख्या की समीक्षा होना जरूरी है।
Conclusion: शून्य नामांकन स्कूल भारत Bharati Fast News
भारत में “शून्य नामांकन” स्कूलों का आंकड़ा शिक्षा के क्षेत्र में आई संसाधन संकट और मैनेजमेंट की जरूरत का खुलासा करता है।
लगभग 8,000 स्कूलों में 20,000 टीचर्स की नियुक्ति बजटीय बोझ और प्रशासनिक चुनौती दोनों है।
सरकार अधिकादिक “बच्चे-शिक्षक अनुपात”, स्कूल विलय, टीचर ट्रेनिंग, और स्कूल इन्फ्रास्ट्रक्चर के रिसोर्स ऑडिट की तरफ कदम बढ़ा रही है।
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आग्रह और आपके अमूल्य सुझाव
क्या आपके जिले में भी ऐसा कोई स्कूल है?
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Disclaimer: यह लेख शिक्षा मंत्रालय के UDISE+ आंकड़ों, सरकारी प्रेस रिलीज और मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है।
आंकड़ों में राज्यों के updates और सत्रानुसार परिवर्तन संभव हैं। कृपया अंतिम तथ्य के लिए सरकारी वेबसाइट जरूर देखें।
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