अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अपने बयान को लेकर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में हैं। ट्रंप ने मजाकिया अंदाज में कहा कि अगर अमेरिका के लोग उनसे ऊब गए, तो वह इजरायल चले जाएंगे और वहां प्रधानमंत्री बन जाएंगे। इस दौरान उन्होंने इजरायल में अपनी लोकप्रियता 99 प्रतिशत होने का दावा भी किया। ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है, जब इजरायल में बेंजामिन नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति और सरकार गठन को लेकर चर्चाएं तेज हैं।
ट्रंप का बड़ा बयान: अमेरिका से ऊबे तो इजरायल में बनूंगा PM
डोनाल्ड ट्रंप ने 3 नवंबर 2026 को अमेरिका के मिडटर्म चुनाव के दिन Fox News के कार्यक्रम ‘Fox & Friends’ से फोन पर बातचीत की। इस दौरान उन्होंने इजरायल में अपनी लोकप्रियता का जिक्र करते हुए कहा कि उनका अप्रूवल रेटिंग 99 प्रतिशत है।
ट्रंप ने कहा कि अगर अमेरिका के लोग उनसे कभी ऊब गए, तो वह इजरायल चले जाएंगे और वहां प्रधानमंत्री बन जाएंगे। उनका यह बयान मजाकिया अंदाज में दिया गया था। इसे इजरायल की राजनीति में उतरने की औपचारिक घोषणा नहीं माना जा रहा है।
हालांकि, ट्रंप के इस बयान ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में चर्चा को जरूर बढ़ा दिया है। खासकर इसलिए क्योंकि इजरायल के मौजूदा प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति इस समय काफी चुनौतीपूर्ण बताई जा रही है।
इजरायल में 99% लोकप्रियता का ट्रंप का दावा
ट्रंप ने बातचीत के दौरान दावा किया कि इजरायल में उनकी लोकप्रियता 99 प्रतिशत है। हालांकि, उन्होंने इस आंकड़े के समर्थन में किसी विशेष सर्वे या पोल का नाम नहीं बताया। इसलिए इस दावे को स्वतंत्र रूप से प्रमाणित लोकप्रियता आंकड़ा नहीं माना जा सकता।
इजरायल में ट्रंप को लेकर सकारात्मक विचार रखने वाले लोगों की संख्या विभिन्न सर्वेक्षणों में सामने आई है, लेकिन 99 प्रतिशत समर्थन का दावा एक अलग बात है। किसी अमेरिकी राष्ट्रपति के प्रति विश्वास या उनकी नीतियों का समर्थन करना और उन्हें इजरायल का प्रधानमंत्री बनाने की इच्छा रखना अलग-अलग विषय हैं।
ट्रंप के बयान को इसी संदर्भ में देखना जरूरी है।
नेतन्याहू की सत्ता पर संकट क्यों बढ़ा?
इजरायल में 27 अक्टूबर 2026 को हुए चुनाव के बाद राजनीतिक स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के दक्षिणपंथी गठबंधन को सबसे अधिक सीटें मिलने के बावजूद संसद में स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं हुआ। विपक्षी गठबंधन भी सरकार बनाने के लिए आवश्यक संख्या तक नहीं पहुंच पाया।
ऐसे में सरकार गठन के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच बातचीत महत्वपूर्ण हो गई है। नेतन्याहू के सामने गठबंधन सहयोगियों को साथ रखने और संसद का विश्वास हासिल करने की चुनौती है।
यदि कोई भी गठबंधन बहुमत जुटाने में सफल नहीं होता है, तो इजरायल में राजनीतिक गतिरोध लंबा खिंच सकता है। ऐसी स्थिति में दोबारा चुनाव की संभावना भी बन सकती है।
अरब पार्टियों की भूमिका क्यों हुई अहम?
इजरायल के चुनावी परिणामों में अरब पार्टियों की भूमिका महत्वपूर्ण बनकर उभरी है। रिपोर्टों के अनुसार, अरब दलों को संसद में लगभग 18 सीटें मिलने की संभावना ने सरकार गठन के समीकरण को प्रभावित किया है।
इजरायल की संसद को नेसेट कहा जाता है। यहां सरकार बनाने के लिए राजनीतिक दलों को बहुमत का समर्थन जुटाना होता है। जब किसी गठबंधन के पास स्पष्ट बहुमत नहीं होता, तब छोटे दलों का समर्थन निर्णायक बन सकता है।
अरब पार्टियों के समर्थन या सहयोग को लेकर इजरायल के विभिन्न राजनीतिक खेमों में मतभेद हैं। यही कारण है कि सरकार गठन की प्रक्रिया आसान नहीं दिखाई दे रही है।
क्या अरब पार्टियां नेतन्याहू की सत्ता बदल सकती हैं?
अरब पार्टियों की भूमिका सरकार गठन के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन केवल उनकी सीटों के आधार पर यह निश्चित नहीं कहा जा सकता कि नेतन्याहू की सत्ता समाप्त हो जाएगी। अंतिम फैसला गठबंधन वार्ता, राजनीतिक समझौते और नेसेट में समर्थन पर निर्भर करेगा।
क्या डोनाल्ड ट्रंप वास्तव में इजरायल के प्रधानमंत्री बन सकते हैं?
ट्रंप का बयान एक मजाकिया टिप्पणी था। इजरायल में प्रधानमंत्री बनने के लिए वहां की संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है। प्रधानमंत्री को नेसेट का सदस्य होना और संसद का विश्वास प्राप्त करना होता है।
इजरायल के कानून के अनुसार, नेसेट का सदस्य बनने के लिए इजरायली नागरिकता और निर्धारित पात्रता शर्तें जरूरी हैं। केवल इजरायल में जाकर रहने से कोई व्यक्ति प्रधानमंत्री नहीं बन सकता।
इसलिए ट्रंप का यह बयान राजनीतिक मजाक और उनकी लोकप्रियता के दावे के रूप में देखा जा रहा है, न कि प्रधानमंत्री पद के लिए वास्तविक चुनावी घोषणा के रूप में।
इजरायल को अमेरिकी सहायता बंद करने का भी ऐलान
ट्रंप ने इसी बातचीत के दौरान इजरायल को मिलने वाली लगभग 4 अरब डॉलर की वार्षिक अमेरिकी सहायता को 2027 से समाप्त करने की बात भी कही। उनके अनुसार, इजरायल अब आर्थिक रूप से इतना मजबूत है कि उसे इस सहायता की जरूरत नहीं है।
ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिका इजरायल को सैन्य उपकरणों की बिक्री जारी रख सकता है। उन्होंने दावा किया कि इस विषय पर उनकी और नेतन्याहू की बातचीत लंबे समय से चल रही थी।
यदि यह बदलाव लागू होता है, तो अमेरिका और इजरायल के संबंधों में सहायता के स्वरूप को लेकर महत्वपूर्ण परिवर्तन हो सकता है। हालांकि, इसके क्रियान्वयन और विस्तृत शर्तों को लेकर आधिकारिक जानकारी महत्वपूर्ण होगी।
अमेरिका-इजरायल संबंधों पर क्या पड़ेगा असर?
डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू लंबे समय से करीबी सहयोगी रहे हैं। दोनों देशों के संबंधों में सुरक्षा, सैन्य सहयोग और ईरान से जुड़े मुद्दे अहम रहे हैं।
हालांकि, इजरायल में सरकार गठन की अनिश्चितता और अमेरिकी सहायता को लेकर ट्रंप के नए बयान ने इन संबंधों पर चर्चा को बढ़ा दिया है। आने वाले समय में इजरायल की नई सरकार और अमेरिका की नीतियां क्षेत्रीय राजनीति को प्रभावित कर सकती हैं।
फिलहाल ट्रंप का इजरायल में प्रधानमंत्री बनने वाला बयान चर्चा का विषय बना हुआ है, जबकि नेतन्याहू के लिए सबसे बड़ी चुनौती संसद में बहुमत जुटाकर सरकार बनाना है।
Trump Israel PM Statement FAQs
डोनाल्ड ट्रंप ने इजरायल का प्रधानमंत्री बनने की बात कब कही?
डोनाल्ड ट्रंप ने 3 नवंबर 2026 को अमेरिका के मिडटर्म चुनाव के दिन Fox News के कार्यक्रम ‘Fox & Friends’ से बातचीत में यह टिप्पणी की।
ट्रंप ने इजरायल में अपनी लोकप्रियता कितनी बताई?
ट्रंप ने इजरायल में अपनी लोकप्रियता 99 प्रतिशत होने का दावा किया, लेकिन उन्होंने इस आंकड़े के समर्थन में किसी विशिष्ट सर्वे का उल्लेख नहीं किया।
क्या ट्रंप वास्तव में इजरायल के प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं?
उनकी टिप्पणी मजाकिया अंदाज में थी। उन्होंने इजरायल की राजनीति में उतरने की कोई औपचारिक घोषणा नहीं की।
इजरायल में नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति कैसी है?
अक्टूबर 2026 के चुनाव के बाद नेतन्याहू के गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। सरकार गठन के लिए राजनीतिक दलों के बीच बातचीत महत्वपूर्ण है।
इजरायल की राजनीति में अरब पार्टियों की भूमिका क्या है?
अरब पार्टियों की संसद में सीटें सरकार गठन के समीकरण को प्रभावित कर सकती हैं। उनका समर्थन कुछ गठबंधनों के लिए निर्णायक हो सकता है।
क्या अमेरिका 2027 से इजरायल को आर्थिक सहायता बंद करेगा?
ट्रंप ने लगभग 4 अरब डॉलर की वार्षिक सहायता समाप्त करने की बात कही है। इस प्रस्ताव के लागू होने की विस्तृत प्रक्रिया और आधिकारिक शर्तों पर नजर रखना जरूरी है।

























