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Home - State News - कर्नाटक सरकार को बड़ा झटका, कोर्ट ने दी प्रियांक खरगे के क्षेत्र में RSS को मार्च करने की अनुमति | Bharati Fast News

कर्नाटक सरकार को बड़ा झटका, कोर्ट ने दी प्रियांक खरगे के क्षेत्र में RSS को मार्च करने की अनुमति | Bharati Fast News

RSS मार्च विवाद: घटनाओं का विस्तृत विवरण, जाने पूरी खबर।

Uday Jeet Singh by Uday Jeet Singh
19/10/2025
in State News, Political News
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कर्नाटक-सरकार
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कर्नाटक सरकार को बड़ा झटका, कोर्ट ने दी प्रियांक खरगे के क्षेत्र में RSS को मार्च करने की अनुमति | Bharati Fast News

कर्नाटक की कांग्रेस सरकार को न्यायिक मोर्चे पर एक बड़ा और अप्रत्याशित झटका लगा है जब कर्नाटक हाई कोर्ट ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को मंत्री प्रियांक खरगे के गृह क्षेत्र चित्तापुर में 2 नवंबर 2025 को शताब्दी मार्च करने की अनुमति प्रदान की है ।​

कर्नाटक सरकार RSS मार्च प्रियांक खरगे मामले में न्यायाधीश एमजीएस कमल की अदालत ने रविवार को आपातकालीन सुनवाई करते हुए RSS को नया आवेदन देने का निर्देश दिया और 24 अक्टूबर को अगली सुनवाई निर्धारित की। यह फैसला न केवल राज्य सरकार की RSS-विरोधी नीति के खिलाफ एक बड़ी न्यायिक जीत माना जा रहा है, बल्कि संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का भी उदाहरण है।

कर्नाटक-सरकार-1


RSS मार्च विवाद: घटनाओं का विस्तृत विवरण, जाने पूरी खबर।

प्रारंभिक आवेदन और इनकार

RSS कलबुर्गी के जिला संयोजक अशोक पाटिल ने 14 अक्टूबर 2025 को चित्तापुर तहसीलदार के पास संगठन के शताब्दी मार्च की अनुमति के लिए आवेदन दिया था । इस आवेदन में RSS ने अपने 100वें स्थापना वर्ष के उपलक्ष्य में विजयदशमी के अवसर पर शांतिपूर्ण मार्च का प्रस्ताव रखा था।​

हालांकि, 18 अक्टूबर को चित्तापुर तहसीलदार ने इस आवेदन को अस्वीकार कर दिया। तहसीलदार का तर्क था कि उसी समय और स्थान पर भीम आर्मी और भारतीय दलित पैंथर जैसे संगठनों ने भी रैली की अनुमति मांगी थी, जिससे कानून-व्यवस्था की समस्या हो सकती थी ।​

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न्यायालय में याचिका और आपातकालीन सुनवाई

अनुमति के इनकार के बाद RSS ने 19 अक्टूबर को कर्नाटक हाई कोर्ट के कलबुर्गी बेंच में एक रिट याचिका दायर की। न्यायाधीश एमजीएस कमल ने रविवार को विशेष सुनवाई का आयोजन किया, जो इस मामले की गंभीरता को दर्शाता है ।​


प्रियांक खरगे की भूमिका और RSS विरोधी रुख

मंत्री का स्पष्ट विरोध

कर्नाटक के ग्रामीण विकास और पंचायतीराज मंत्री प्रियांक खरगे ने हाल के दिनों में RSS गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाने की मांग करते हुए एक मजबूत रुख अपनाया था। उन्होंने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को एक विस्तृत पत्र लिखकर निम्नलिखित मांगें रखी थीं :​

  • सरकारी शिक्षण संस्थानों में RSS की गतिविधियों पर रोक: सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में पाठ्यक्रम के बाहर की गतिविधियों के लिए अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

  • सरकारी कर्मचारियों पर पाबंदी: राज्य सरकार के अधिकारियों को RSS कार्यक्रमों में भाग लेने से रोका जाना चाहिए, क्योंकि यह कर्नाटक राज्य सिविल सेवा (आचरण) नियम, 2021 के नियम 5(1) का उल्लंघन है।

  • राज्य के मंदिरों में प्रतिबंध: राज्य सरकार के स्वामित्व वाले मंदिरों में भी RSS की गतिविधियों पर पाबंदी होनी चाहिए।

सुरक्षा चिंताएं और धमकियां

प्रियांक खरगे के इस स्पष्ट रुख के कारण उन्हें धमकियों का सामना करना पड़ा है। पिछले कुछ दिनों में उनके निवास की सुरक्षा बढ़ानी पड़ी क्योंकि उन्हें कई तरह की धमकियां मिली थीं । यह स्थिति कर्नाटक सरकार RSS मार्च प्रियांक खरगे विवाद को और भी जटिल बना देती है।​


न्यायालय का निर्णय: कानूनी पहलू और तर्क

न्यायाधीश के महत्वपूर्ण प्रश्न

न्यायाधीश एमजीएस कमल ने सुनवाई के दौरान कई महत्वपूर्ण और संवैधानिक प्रश्न उठाए जो इस मामले की जटिलता को दर्शाते हैं :​

  1. अनुमति का कानूनी अधिकार: मार्च के लिए अनुमति देने का वास्तविक अधिकार किस प्राधिकरण के पास है?

  2. शांतिपूर्ण सभा का अधिकार: क्या शांतिपूर्ण मार्च के लिए भी अनुमति आवश्यक होती है?

  3. संवैधानिक अधिकारों का संतुलन: सभी संगठनों के संवैधानिक अधिकारों का सम्मान कैसे किया जा सकता है?

  4. कानून-व्यवस्था की चुनौती: विभिन्न संगठनों की समान मांगों को कैसे संभाला जाए?

कोर्ट के निर्देश और शर्तें

न्यायालय ने RSS को निम्नलिखित विस्तृत निर्देश दिए :​

आवेदन की आवश्यकताएं:

  • मार्च का विस्तृत रूट मैप

  • समय और स्थान का स्पष्ट विवरण

  • प्रतिभागियों की संभावित संख्या

  • वक्ताओं की पूरी जानकारी

  • संगठन के पंजीकरण विवरण

प्राधिकरण स्तर:

  • जिला कलेक्टर को नया आवेदन देना होगा

  • तालुका कार्यकारी मजिस्ट्रेट को प्रति भेजनी होगी

  • पुलिस को भी सूचना देनी होगी


अन्य संगठनों की स्थिति और न्यायिक संतुलन

समान अधिकार, अलग समय

कोर्ट ने एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए यह भी निर्देश दिया कि भीम आर्मी और दलित पैंथर को भी अलग समय स्लॉट दिए जाएं ताकि किसी भी प्रकार का टकराव न हो । यह निर्णय न्यायपालिका की निष्पक्षता और सभी संगठनों के संवैधानिक अधिकारों के प्रति सम्मान को दर्शाता है।​

न्यायालय का संदेश:

  • सभी संगठनों के पास समान अधिकार हैं

  • कानून-व्यवस्था बनाए रखना सर्वोपरि है

  • लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान आवश्यक है


भाजपा की प्रतिक्रिया: लोकतंत्र की जीत

पार्टी नेताओं के बयान

भाजपा ने इस न्यायिक फैसले को लोकतंत्र और संवैधानिक अधिकारों की बड़ी जीत बताया है। भाजपा कर्नाटक अध्यक्ष बीवाई विजयेंद्र ने कहा कि यह राष्ट्रवादी संगठनों के लिए न्याय की बहाली है ।​

भाजपा के मुख्य तर्क:

  • कांग्रेस सरकार तानाशाही कर रही है

  • राष्ट्रवादी संगठनों को दबाने की कोशिश की जा रही है

  • “किम जोंग उन स्टाइल” की सरकारी नीति अपनाई जा रही है

केंद्रीय नेताओं की टिप्पणी

भाजपा प्रवक्ता शहज़ाद पूनावाला ने कर्नाटक सरकार पर तीखा हमला करते हुए कहा कि कांग्रेस “आतंकवादियों के लिए बल्लेबाजी” कर रही है और राष्ट्रवादी संगठनों को प्रतिबंधित करने की कोशिश में लगी है ।​


RSS का शताब्दी वर्ष: ऐतिहासिक महत्व

100 साल की विरासत

2025 में RSS अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है, जो भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। इसके तहत देशभर में विभिन्न सांस्कृतिक और सामाजिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं ।​

शताब्दी मार्च के उद्देश्य:

  • संगठन की 100 साल की गौरवशाली विरासत का उत्सव

  • विजयदशमी के पवित्र अवसर पर सामुदायिक एकता

  • राष्ट्रीय भावना और अनुशासन का प्रसार

  • युवाओं में संस्कार और मूल्यों का विकास

सांस्कृतिक बनाम राजनीतिक दृष्टिकोण

RSS का स्पष्ट तर्क है कि यह एक शांतिपूर्ण सांस्कृतिक कार्यक्रम है, न कि कोई राजनीतिक विरोध प्रदर्शन। संगठन का कहना है कि यह भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने वाला कार्यक्रम है।


कानूनी विशेषज्ञों की राय

संवैधानिक अधिकारों का सवाल

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा के अधिकार से जुड़ा है। न्यायालय का यह निर्णय इन मौलिक अधिकारों की रक्षा करता है।

संवैधानिक पहलू:

  • अनुच्छेद 19(1)(a): अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

  • अनुच्छेद 19(1)(b): शांतिपूर्ण सभा का अधिकार

  • अनुच्छेद 25: धर्म और संस्कृति की स्वतंत्रता


राजनीतिक प्रभाव और भविष्य के परिणाम

तत्काल राजनीतिक प्रभाव

यह न्यायिक फैसला कर्नाटक की राजनीति में कई मायनों में गहरा प्रभाव डालने वाला है:

कांग्रेस सरकार पर प्रभाव:

  • सरकार की छवि को नुकसान

  • RSS-विरोधी नीति पर पुनर्विचार की आवश्यकता

  • न्यायपालिका के सामने कमजोर स्थिति

भाजपा-RSS के लिए लाभ:

  • मनोबल में वृद्धि

  • लोकतांत्रिक मूल्यों के संरक्षक के रूप में छवि

  • सामाजिक समर्थन में वृद्धि

दीर्घकालिक राजनीतिक परिणाम

आने वाले चुनावों में प्रभाव:

  • हिंदू मतदाताओं में भाजपा के प्रति सहानुभूति

  • कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता की छवि पर प्रश्नचिह्न

  • केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव

संघीय ढांचे पर प्रभाव:

  • राज्य सरकारों की सीमाओं का स्पष्टीकरण

  • न्यायपालिका की भूमिका में वृद्धि

  • संवैधानिक संस्थानों की मजबूती

कर्नाटक-सरकार-2


मीडिया कवरेज और सामाजिक प्रतिक्रिया

राष्ट्रीय मीडिया की भूमिका

इस घटना को राष्ट्रीय मीडिया ने व्यापक कवरेज दी है। NDTV, Times of India, Indian Express, और Hindustan Times जैसे प्रमुख मीडिया संगठनों ने इसे “कर्नाटक सरकार की बड़ी हार” और “न्यायपालिका की स्वतंत्रता का प्रमाण” बताया है ।​

सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया

समर्थकों की प्रतिक्रिया:

  • RSS समर्थकों में खुशी की लहर

  • लोकतंत्र की जीत के रूप में उत्सव

  • न्यायपालिका के प्रति आभार

विरोधियों की चिंता:

  • सांप्रदायिक तनाव की आशंका

  • कानून-व्यवस्था की चुनौतियां

  • राजनीतिक ध्रुवीकरण की संभावना


अन्य राज्यों में इसका प्रभाव

मिसाल का महत्व

यह निर्णय अन्य राज्यों में भी इसी तरह के विवादों के लिए एक न्यायिक मिसाल स्थापित करता है। राजस्थान, महाराष्ट्र, और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भी RSS और अन्य संगठनों के साथ इसी तरह के विवाद हो सकते हैं।

व्यापक प्रभाव:

  • संघीय ढांचे में स्पष्टता

  • धार्मिक-सांस्कृतिक संगठनों के अधिकार

  • राज्य सरकारों की सीमा निर्धारण


आगे की रणनीति और चुनौतियां

RSS की रणनीति

2 नवंबर के मार्च की तैयारी:

  • विस्तृत योजना का निर्माण

  • स्थानीय समुदाय के साथ संपर्क

  • शांति और अनुशासन का संदेश

कर्नाटक सरकार की चुनौतियां

राजनीतिक दबाव का सामना:

  • न्यायिक निर्णय का सम्मान

  • कानून-व्यवस्था की व्यवस्था

  • विविध समुदायों के बीच संतुलन


निष्कर्ष: कर्नाटक सरकार RSS मार्च प्रियांक खरगे मामले में कर्नाटक हाई कोर्ट का निर्णय भारतीय लोकतंत्र और न्यायिक व्यवस्था की परिपक्वता को दर्शाता है। यह फैसला यह स्पष्ट करता है कि भारत में न्यायपालिका राजनीतिक दबाव और पक्षपात से ऊपर उठकर संविधान के मौलिक सिद्धांतों के अनुसार निर्णय लेती है। यह मामला सभी राजनीतिक दलों और संगठनों के लिए एक महत्वपूर्ण सबक है कि संवैधानिक अधिकार सभी के लिए समान हैं और इन्हें राजनीतिक लाभ के लिए दबाया नहीं जा सकता। RSS का शताब्दी मार्च न केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम है बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के महत्व को भी रेखांकित करता है। यह निर्णय भविष्य में होने वाले इसी तरह के विवादों के लिए एक मजबूत न्यायिक मिसाल स्थापित करता है और यह सुनिश्चित करता है कि भारत में सभी संगठनों के संवैधानिक अधिकारों का सम्मान होता रहे।


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Disclaimer: यह लेख समसामयिक घटनाओं के आधार पर तैयार किया गया है। सभी तथ्य विश्वसनीय न्यूज़ सोर्स से एकत्रित किए गए हैं। राजनीतिक घटनाओं की स्थिति में परिवर्तन हो सकता है।


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Uday Jeet Singh

Uday- Bharati Fast News में लेखक के रूप में कार्यरत हैं। ये टेक्नोलॉजी, मनोरंजन, खेल और सामयिक घटनाओं से संबंधित विषयों पर समाचार लेखन करते हैं।इनका कार्य विश्वसनीय स्रोतों से जानकारी एकत्र करना, तथ्यों का सत्यापन करना और पाठकों तक स्पष्ट एवं सटीक समाचार पहुँचाना है। Uday द्वारा तैयार की गई सामग्री संपादकीय समीक्षा के बाद प्रकाशित की जाती है।भूमिका: Author – Bharati Fast News

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