अल नीनो के बाद क्या आएगी ला नीना? 2027 के मौसम को लेकर बढ़ी चिंता
अल नीनो और ला नीना: दुनिया के मौसम को प्रभावित करने वाला अल नीनो इस समय तेजी से मजबूत हो रहा है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, 2026 के आखिर तक इसकी ताकत और बढ़ सकती है और इसका असर 2027 की शुरुआत तक दिखाई देने की संभावना है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अल नीनो कमजोर पड़ने के बाद क्या प्रशांत महासागर में ला नीना की स्थिति बनेगी या मौसम सामान्य होने लगेगा?
अक्टूबर 2026 में जारी पूर्वानुमानों के मुताबिक, मौजूदा अल नीनो की स्थिति सर्दियों के दौरान भी बने रहने की प्रबल संभावना है। हालांकि, इसके बाद ला नीना आने को लेकर अभी कोई पक्का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। वैज्ञानिक मॉडल फिलहाल अल नीनो के धीरे-धीरे कमजोर पड़ने और 2027 के मध्य तक तटस्थ स्थिति की संभावना बढ़ने के संकेत दे रहे हैं।
अल नीनो 2026 में क्यों बन रहा है चिंता का विषय?
अल नीनो प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक होने की स्थिति है। इससे समुद्र और वायुमंडल के बीच होने वाली गतिविधियों में बदलाव आता है, जिसका असर दुनिया के कई हिस्सों में बारिश, तापमान और मौसमी परिस्थितियों पर पड़ सकता है।
अमेरिका की राष्ट्रीय समुद्री एवं वायुमंडलीय प्रशासन (NOAA) के क्लाइमेट प्रेडिक्शन सेंटर की 8 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, अल नीनो लगातार मजबूत हो रहा है। रिपोर्ट में जनवरी से मार्च 2027 तक मजबूत से बहुत मजबूत अल नीनो बने रहने की संभावना 83 प्रतिशत से अधिक बताई गई है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने भी चेतावनी दी है कि इस घटना के कारण दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में तापमान और वर्षा के पैटर्न में बदलाव आ सकता है। कुछ जगहों पर सूखे और गर्मी का जोखिम बढ़ सकता है, जबकि अन्य क्षेत्रों में भारी बारिश और बाढ़ की आशंका बढ़ सकती है। हालांकि, इसका वास्तविक असर हर क्षेत्र में अलग हो सकता है।
अल नीनो और ला नीना में क्या अंतर है?
अल नीनो और ला नीना, दोनों प्रशांत महासागर और वायुमंडल के बीच होने वाली प्राकृतिक जलवायु प्रक्रिया के अलग-अलग चरण हैं। इनका प्रभाव दुनिया के मौसम पर पड़ सकता है, लेकिन दोनों की परिस्थितियां एक जैसी नहीं होतीं।
- अल नीनो: मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। इससे वैश्विक तापमान और वर्षा के पैटर्न प्रभावित हो सकते हैं।
- ला नीना: इसी क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से कम हो जाता है। इससे वायुमंडलीय परिसंचरण और बारिश के वितरण में अलग तरह के बदलाव हो सकते हैं।
- तटस्थ स्थिति: जब समुद्र की सतह का तापमान अल नीनो या ला नीना की निर्धारित सीमा में नहीं आता, तो ENSO की स्थिति को सामान्य या तटस्थ कहा जा सकता है।
यह समझना जरूरी है कि ला नीना को अल नीनो का निश्चित अगला चरण नहीं माना जा सकता। एक मजबूत अल नीनो के कमजोर पड़ने के बाद तटस्थ स्थिति भी बन सकती है। आगे कौन-सी स्थिति विकसित होगी, इसका आकलन समुद्र के तापमान, हवाओं और नए जलवायु मॉडल के आधार पर किया जाता है।
2027 में ला नीना आने की कितनी संभावना है?
यह इस समय सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। कोलंबिया यूनिवर्सिटी के इंटरनेशनल रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट एंड सोसाइटी (IRI) के अक्टूबर 2026 के मॉडल-आधारित पूर्वानुमान में अल नीनो के 2027 के शुरुआती महीनों से लेकर वसंत तक बने रहने के मजबूत संकेत हैं। इसके बाद इसकी संभावना धीरे-धीरे कम होती दिखाई देती है।
इस पूर्वानुमान के अनुसार, जून से अगस्त 2027 के दौरान ENSO की तटस्थ स्थिति सबसे संभावित परिणाम बन सकती है। इसका अर्थ है कि मौजूदा अल नीनो के कमजोर पड़ने के बाद मौसम की यह प्रणाली कुछ समय के लिए सामान्य सीमा के करीब लौट सकती है।
अभी उपलब्ध इस मॉडल-आधारित पूर्वानुमान में 2027 के शुरुआती महीनों तक ला नीना की संभावना प्रमुख रूप से सामने नहीं आती। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि अल नीनो के बाद ला नीना जरूर आएगी। आने वाले महीनों के नए पूर्वानुमान इस तस्वीर को और स्पष्ट कर सकते हैं।
भारत के मानसून और खेती पर क्या हो सकता है असर?
भारत में अल नीनो को लेकर विशेष चिंता रहती है, क्योंकि इसका संबंध मानसून की गतिविधियों से हो सकता है। कई अल नीनो घटनाओं के दौरान भारत में मानसून कमजोर रहा है, लेकिन हर बार ऐसा हो, यह जरूरी नहीं है। भारतीय मानसून पर हिंद महासागर की परिस्थितियों, भारतीय महासागर द्विध्रुव (IOD), क्षेत्रीय मौसम प्रणालियों और अन्य कारकों का भी असर पड़ता है।
अगर 2027 में अल नीनो लंबे समय तक बना रहता है, तो भारत में बारिश के मौसमी वितरण पर इसके संभावित प्रभाव को ध्यान से देखना होगा। खेती, जलाशयों और जल प्रबंधन की योजना बनाने वालों के लिए क्षेत्रवार मौसम पूर्वानुमान महत्वपूर्ण रहेंगे।
दूसरी ओर, यदि भविष्य में ला नीना विकसित होती है, तो भारत सहित कई क्षेत्रों में वर्षा का पैटर्न बदल सकता है। लेकिन ला नीना का मतलब पूरे भारत में सामान्य से अधिक बारिश होना नहीं है। किसी भी साल मानसून कैसा रहेगा, इसका आकलन भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आधिकारिक पूर्वानुमान से ही करना चाहिए।
दुनिया में गर्मी, सूखे और बाढ़ का खतरा
अल नीनो वैश्विक औसत तापमान को बढ़ाने में योगदान दे सकता है। इसके कारण कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक गर्मी और सूखे का खतरा बढ़ सकता है, जबकि दूसरे क्षेत्रों में भारी वर्षा और बाढ़ जैसी घटनाओं की संभावना बदल सकती है। इसका प्रभाव स्थानीय जलवायु, समुद्र की परिस्थितियों और अन्य मौसम प्रणालियों पर निर्भर करेगा।
मौजूदा घटना की तीव्रता को देखते हुए वैज्ञानिक 2026 के अंत और 2027 की शुरुआत में मौसम के बदलावों पर नजर रख रहे हैं। हालांकि, किसी खास क्षेत्र में कब और कितनी गर्मी, बारिश या सूखा पड़ेगा, यह केवल अल नीनो के आधार पर निश्चित रूप से नहीं बताया जा सकता।
अल नीनो के बाद मौसम की दिशा पर वैज्ञानिकों की नजर
अगले कुछ महीनों में प्रशांत महासागर के तापमान और हवाओं में होने वाले बदलाव यह समझने में मदद करेंगे कि अल नीनो कब कमजोर पड़ना शुरू होगा। इसके बाद मौसम तटस्थ स्थिति की ओर लौटेगा या ला नीना विकसित होगी, इस पर वैज्ञानिकों की नजर बनी रहेगी।
फिलहाल सबसे मजबूत संकेत यही हैं कि अल नीनो 2027 की शुरुआत तक बना रह सकता है। इसके बाद तटस्थ स्थिति की संभावना बढ़ने के संकेत हैं, लेकिन ला नीना के आगमन को लेकर अभी निश्चित दावा नहीं किया जा सकता। इसलिए लंबे समय के मौसम संबंधी निष्कर्षों के लिए नवीनतम आधिकारिक पूर्वानुमानों को देखना जरूरी है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. अल नीनो क्या है?
अल नीनो प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक होने की जलवायु स्थिति है। यह दुनिया के तापमान और वर्षा के पैटर्न को प्रभावित कर सकती है।
2. क्या 2027 में ला नीना आएगी?
अभी इसकी पुष्टि नहीं हुई है। अक्टूबर 2026 के मॉडल पूर्वानुमान अल नीनो के कमजोर पड़ने के बाद तटस्थ स्थिति की संभावना बढ़ने के संकेत देते हैं। ला नीना की संभावना को लेकर आगे के पूर्वानुमान महत्वपूर्ण होंगे।
3. अल नीनो 2027 तक क्यों चर्चा में है?
अक्टूबर 2026 के NOAA पूर्वानुमान के अनुसार, मजबूत से बहुत मजबूत अल नीनो के जनवरी-मार्च 2027 तक बने रहने की संभावना 83 प्रतिशत से अधिक है।
4. क्या अल नीनो भारत के मानसून को कमजोर करता है?
अल नीनो के दौरान भारत में कमजोर मानसून का जोखिम बढ़ सकता है, लेकिन यह निश्चित नियम नहीं है। मानसून पर कई समुद्री और वायुमंडलीय कारकों का संयुक्त प्रभाव पड़ता है।
5. ला नीना और अल नीनो में मुख्य अंतर क्या है?
अल नीनो में भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से गर्म होता है, जबकि ला नीना में उसी क्षेत्र का पानी सामान्य से ठंडा होता है। दोनों दुनिया के मौसम को अलग-अलग तरीके से प्रभावित कर सकते हैं।
निष्कर्ष
2026 का मजबूत होता अल नीनो 2027 की शुरुआत तक दुनिया के मौसम को प्रभावित कर सकता है। इसके बाद ला नीना आएगी या ENSO की स्थिति तटस्थ होगी, इसका फैसला अभी नहीं हुआ है। फिलहाल वैज्ञानिक पूर्वानुमानों में तटस्थ स्थिति की संभावना बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं। भारत में मानसून और खेती पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में अधिक स्पष्ट जानकारी के लिए आगामी आधिकारिक मौसम पूर्वानुमानों पर नजर रखना जरूरी होगा।





























