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Home - Weather News - El नीनो की दस्तक से बढ़ी चिंता, जून में तेज गर्मी और कमजोर मॉनसून के संकेत

El नीनो की दस्तक से बढ़ी चिंता, जून में तेज गर्मी और कमजोर मॉनसून के संकेत

मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि El Niño के सक्रिय होने से बारिश का पैटर्न प्रभावित हो सकता है और कई राज्यों में गर्मी लंबे समय तक बनी रह सकती है | Bharati Fast News

Abhay Jeet Singh by Abhay Jeet Singh
01/06/2026
in Weather News, News
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El नीनो

El नीनो का असर: जून में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी और कमजोर मॉनसून की चेतावनी

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El नीनो की दस्तक से बढ़ी चिंता, जून में तेज गर्मी और कमजोर मॉनसून के संकेत

आसमान से बरसते अंगारे, झुलसा देने वाली गर्म पछुआ हवाएं और पानी की एक-एक बूंद के लिए सूखते ग्रामीण इलाकों के हैंडपंप। जेठ की इस तपती दुपहरी में जब एक किसान अपने फटे हुए जूतों से खेत की सूखी मिट्टी को कुरेदता है, तो उसकी पथराई आँखें केवल बादलों के एक काले टुकड़े की तलाश कर रही होती हैं। हर साल इस समय तक देश में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के आने की खुशबू हवाओं में घुलने लगती थी। लेकिन इस बार प्रशांत महासागर की गहराइयों से एक ऐसा अदृश्य दानव जाग उठा है, जिसने भारतीय मौसम विज्ञानियों की रातों की नींद उड़ा दी है। क्या आप जानते हैं कि हजारों किलोमीटर दूर समुद्र के पानी में आ रहा एक मामूली सा उबाल आपके घर की रसोई के बजट और देश की पूरी अर्थव्यवस्था को कैसे तबाह कर सकता है?

वैश्विक जलवायु चक्र में होने वाले सबसे बड़े बदलाव यानी El नीनो के सक्रिय होने की आधिकारिक पुष्टि ने पूरे दक्षिण एशिया में चिंता की एक गहरी लकीर खींच दी है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और अंतरराष्ट्रीय वेदर सैटेलाइट्स के ताजा मॉडल्स यह साफ संकेत दे रहे हैं कि इस साल जून के महीने में सूरज अपने सबसे रौद्र रूप में होगा। सामान्य रूप से जून के पहले या दूसरे सप्ताह तक मैदानी इलाकों को तरबतर करने वाली मॉनसूनी हवाओं की रफ्तार इस समुद्री हलचल के कारण बेहद सुस्त पड़ गई है। इस खोजी और वैज्ञानिक रिपोर्ट में हम आपको बताएंगे कि यह महासागरीय विसंगति कैसे काम करती है, यह हमारे मॉनसून का रास्ता कैसे रोकती है, और आने वाले दिनों में आपकी जेब और खेती पर इसका क्या व्यावहारिक असर होने वाला है।

क्या है El नीनो और कैसे बिगड़ता है समुद्र का तापमान?

भौतिक और जलवायु विज्ञान के अनुसार, El नीनो एक स्पैनिश शब्द है जिसका अर्थ होता है ‘छोटा बच्चा’। यह एक ऐसी प्राकृतिक समुद्री घटना है जो प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में समुद्र की सतह के पानी के असामान्य रूप से गर्म होने के कारण पैदा होती है। सामान्य परिस्थितियों में, ठंडी समुद्री हवाएं पूर्व से पश्चिम की ओर चलती हैं, जिससे भारत और उसके आसपास के इलाकों में अच्छा कम दबाव का क्षेत्र (Low Pressure) बनता है और मॉनसून के बादल तेजी से आगे बढ़ते हैं।

लेकिन जब यह वेदर सिस्टम सक्रिय होता है, तो हवाओं का यह प्राकृतिक चक्र पूरी तरह उल्टा घूम जाता है। समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से 1.5°C से 2.5°C तक बढ़ जाता है। पानी की यह अतिरिक्त गर्मी वायुमंडलीय दबाव के पूरे संतुलन को बिगाड़ देती है, जिसके कारण भारत की ओर आने वाली नमी से भरी हवाएं रास्ते में ही दिशा बदल देती हैं या कमजोर होकर बिखर जाती हैं।

जून में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी और लू का नया चक्रव्यूह

मौसम विभाग के हालिया सांख्यिकीय आंकड़ों (Statistics) और वेदर ट्रेंड्स को देखें तो जून के महीने में देश के उत्तर-पूर्वी, मध्य और उत्तर-पश्चिमी राज्यों में तापमान सामान्य से 3 से 4 डिग्री अधिक रहने का अनुमान है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली-एनसीआर के इलाकों में ‘कन्वेक्टिव हीटवेव’ (Severe Heatwave) के दिन पहले के मुकाबले दोगुने हो सकते हैं।

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जब मॉनसून की ठंडी हवाएं समय पर मैदानी इलाकों में नहीं पहुंचती हैं, तो जमीन की गर्मी वायुमंडल में ही कैद होकर रह जाती है। इसके कारण रात के समय भी तापमान 32°C से नीचे नहीं गिरता, जिससे इंसानी शरीर को रिकवर होने का समय नहीं मिलता। इस भीषण उमस और लू के कारण देश के पावर ग्रिड्स पर बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच जाएगी, जिससे कई इलाकों में बिजली कटौती का संकट भी गहरा सकता है।

भारतीय खेती पर सीधा प्रहार: धान और गन्ने की फसलों पर संकट

भारतीय कृषि को आज भी ‘मूनसून का जुआ’ कहा जाता है क्योंकि देश की लगभग 50% कृषि भूमि सिंचाई के लिए पूरी तरह से सीधे तौर पर बारिश के पानी पर निर्भर है। इस वेदर डिस्टर्बेंस का सबसे पहला और घातक प्रहार हमारे ग्रामीण जनजीवन और खरीफ की फसलों पर होने जा रहा है।

[El नीनो का सक्रिय होना] --> [मॉनसून की हवाओं का कमजोर पड़ना] --> [धान की बुवाई में देरी] --> [खाद्य महंगाई में भारी उछाल]

जून का महीना धान की नर्सरी तैयार करने, गन्ने की सिंचाई और दलहन-तिलहन की बुवाई के लिए सबसे महत्वपूर्ण कालखंड माना जाता है। यदि जून के शुरुआती 20 दिनों में बारिश नहीं होती है, तो मिट्टी की नमी पूरी तरह समाप्त हो जाएगी। इसके कारण किसानों को भूजल (Groundwater) का अत्यधिक दोहन करना पड़ेगा, जिससे खेती की लागत में अप्रत्याशित बढ़ोतरी होगी। छोटे और सीमांत किसान जो डीजल पंपों के भरोसे खेती करते हैं, उनके लिए यह सीजन आर्थिक रूप से बेहद नुकसानदेह साबित हो सकता है।

एक्सपर्ट ओपिनियन: क्या कहते हैं देश के बड़े जलवायु वैज्ञानिक?

आंचलिक मौसम विज्ञान और रिमोट सेंसिंग सेंटर के पूर्व निदेशक और वरिष्ठ जलवायु शास्त्री डॉ. के. एस. मुर्तजा के अनुसार, इस संकट को हल्के में लेना भारी भूल होगी:

“El नीनो का भारतीय उपमहाद्वीप के साथ एक बहुत ही पुराना और नकारात्मक संबंध रहा है। पिछले 100 सालों के इतिहास को देखें तो भारत में जब-जब बड़े सूखे (Droughts) पड़े हैं, उनमें से 70% मामलों के पीछे यही समुद्री गर्मी जिम्मेदार रही है। इस बार का अलार्म इसलिए ज्यादा डरावना है क्योंकि यह ग्लोबल वार्मिंग के सबसे गर्म साल के साथ ओवरलैप कर रहा है। सरकार को अभी से जिला स्तर पर जल प्रबंधन की आपातकालीन योजनाएं (Contingency Plans) लागू कर देनी चाहिए। यदि जून में बारिश 20% से अधिक कम रहती है, तो हमें खाद्य सुरक्षा और अनाज के बफर स्टॉक को लेकर बेहद सतर्क रहना होगा।”

Key Highlights: मुख्य बिंदु

  • वैश्विक संकट: प्रशांत महासागर में El नीनो प्रणाली के पूरी तरह सक्रिय होने से भारतीय उपमहाद्वीप का मौसम तंत्र प्रभावित।

  • कमजोर मॉनसून: जून के महीने में देश के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से काफी कम बारिश होने के शुरुआती वैज्ञानिक संकेत।

  • भीषण हीटवेव: उत्तर और मध्य भारत के राज्यों में जून के अंत तक लू (Heatwave) के दिनों की संख्या में भारी बढ़ोतरी की चेतावनी।

  • कृषि पर असर: धान, कपास और गन्ने जैसी प्रमुख खरीफ फसलों की बुवाई में देरी होने से बढ़ सकती है किसानों की लागत।

  • महंगाई का खतरा: अनाज और सब्जियों का उत्पादन प्रभावित होने से आने वाले महीनों में खाद्य पदार्थों की कीमतों में तेजी की आशंका।

आर्थिक प्रभाव: आपकी रसोई के बजट पर कैसे पड़ेगी मार?

जब देश का मॉनसून कमजोर होता है, तो उसका सीधा असर दलाल स्ट्रीट से लेकर एक आम आदमी की रसोई के बजट पर दिखाई देता है। नीचे दी गई तालिका के माध्यम से समझिए कि इस वेदर पैटर्न के कारण आपकी जेब पर किस प्रकार से दोहरी मार पड़ने वाली है:

प्रभावित होने वाला क्षेत्रपुराना सामान्य स्तर (Normal Tech)आगामी प्रभाव (Economic Impact)
खाद्य तेल और दालेंघरेलू उत्पादन से मांग और आपूर्ति में संतुलनउत्पादन घटने से विदेशों से आयात बढ़ाना पड़ेगा, जिससे कीमतें 15% तक बढ़ेंगी
सब्जियां और डेयरीग्रामीण अंचलों से शहरों में सुचारू और सस्ती सप्लाईअत्यधिक गर्मी से सब्जियां खेतों में सूखेंगी, चारे की कमी से दूध के दाम बढ़ेंगे
ग्रामीण मांग (Rural Demand)अच्छी फसल होने पर ट्रैक्टर, टू-व्हीलर और एफएमसीजी की बंपर बिक्रीखेती में घाटा होने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था सुस्त होगी, उद्योगों की वृद्धि दर घटेगी

भविष्य का प्रभाव: जल संकट और दीर्घकालिक समाधान की आवश्यकता

यदि यह वेदर पैटर्न लंबे समय तक बना रहता है, तो इसका सबसे खतरनाक असर हमारे देश के प्रमुख जलाशयों और बांधों के जल स्तर (Reservoir Storage Levels) पर पड़ेगा। केंद्रीय जल आयोग (CVC) की चिंता यह है कि यदि जून और जुलाई में बांधों में पानी का इनफ्लो नहीं बढ़ा, तो आने वाले सर्दियों के महीनों में देश के बड़े शहरों में पीने के पानी की भारी किल्लत हो सकती है।

यह संकट हमें यह चेतावनी देता है कि अब हमें पूरी तरह पारंपरिक मौसम चक्र के भरोसे रहना छोड़ना होगा। भविष्य में ऐसे संकटों से निपटने के लिए भारत को ‘क्लाइमेट-स्मार्ट एग्रीकल्चर’ (Climate-Smart Agriculture) को युद्ध स्तर पर अपनाना होगा। ऐसी फसलों के बीजों को विकसित करना होगा जो कम पानी और अत्यधिक तापमान में भी बेहतर उत्पादन दे सकें। साथ ही, ड्रिप इरिगेशन (टपक सिंचाई) और माइक्रो-स्प्रिंकलर्स जैसी तकनीकों को हर खेत तक पहुंचाना होगा ताकि पानी की एक-एक बूंद का शत-प्रतिशत सही उपयोग किया जा सके।

FAQ Section: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1. क्या El नीनो के कारण इस साल पूरे देश में सूखा पड़ेगा?

नहीं, इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि देश में बिल्कुल बारिश नहीं होगी। इसका सीधा प्रभाव यह होता है कि बारिश का वितरण असमान हो जाता है; कुछ राज्यों में बहुत कम बारिश होती है, जबकि कुछ तटीय या पहाड़ी इलाकों में अचानक तेज बारिश (Flash Floods) भी देखने को मिल सकती है। मुख्य रूप से जून और जुलाई के महीनों में बारिश की कुल मात्रा सामान्य से कम रहती है।

2. इसके सक्रिय होने पर आम जनता को स्वास्थ्य के मोर्चे पर क्या सावधानियां बरतनी चाहिए?

चूंकि जून में तेज गर्मी और उमस का स्तर बहुत अधिक रहेगा, इसलिए लोगों को ‘हीट स्ट्रोक’ (Heat Stroke) और गंभीर डिहाइड्रेशन से बचना चाहिए। दोपहर 12 से 4 बजे के बीच बिना जरूरी काम के सीधे धूप में निकलने से बचें। सूती और ढीले कपड़े पहनें, और अपने पास हमेशा नींबू पानी, ओआरएस (ORS) या छाछ जैसी ठंडी चीजें रखें।

3. क्या इस वेदर पैटर्न का असर सर्दियों के मौसम पर भी पड़ता है?

जी हां, जलवायु विज्ञान के अनुसार यदि यह सिस्टम गर्मियों में बहुत मजबूत रहता है, तो इसका असर आने वाली सर्दियों पर भी दिखाई देता है। इसके कारण ठंड के मौसम की शुरुआत में देरी होती है और सर्दियों के दौरान पड़ने वाली कड़ाके की ठंड के दिनों की संख्या काफी कम हो जाती है, जिससे रबी की फसल (जैसे गेहूं) के पकने का चक्र भी प्रभावित होता है।

4. इसके विपरीत काम करने वाली ‘ला नीना’ (La Nina) स्थिति क्या होती है?

‘ला नीना’ इसके बिल्कुल विपरीत काम करने वाली समुद्री घटना है। इसमें प्रशांत महासागर की सतह का पानी सामान्य से अधिक ठंडा हो जाता है। जब ला नीना सक्रिय होता है, तो भारत में सामान्य से बहुत अधिक और बंपर बारिश होती है, जो खेती और जलाशयों के लिए बेहद फायदेमंद मानी जाती है।

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निष्कर्ष: चुनौतियों के बीच सही रणनीतिक तैयारी ही बचाव है

संक्षेप में कहें तो वैश्विक जलवायु परिवर्तन की यह आहट हमें यह साफ संदेश देती है कि प्रकृति के बदलते मिजाज के सामने इंसान की पुरानी प्रणालियां अब नाकाफी साबित हो रही हैं। El नीनो की यह दस्तक निश्चित रूप से एक बड़ी चिंता का विषय है, लेकिन एक जागरूक समाज और दूरदर्शी देश के रूप में यह घबराने का नहीं बल्कि मुस्तैदी से काम करने का समय है। पानी की बर्बादी को रोकना, फसलों के पैटर्न में बदलाव करना और स्थानीय स्तर पर जल संचयन के पुराने ढांचों को पुनर्जीवित करना ही इस अदृश्य संकट के खिलाफ हमारा सबसे बड़ा और अचूक सुरक्षा कवच साबित होगा। प्रकृति के इस कड़े इम्तिहान का सामना पूरी योजना और वैज्ञानिक सूझबूझ के साथ करें।

Disclaimer: इस लेख में प्रस्तुत किए गए मौसम के पूर्वानुमान, सांख्यिकीय आंकड़े और तकनीकी विश्लेषण भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD), विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की हालिया क्लाइमेट रिपोर्ट्स और वरिष्ठ पर्यावरण वैज्ञानिकों के प्राथमिक शोध पत्रों पर आधारित हैं। महासागरीय धाराओं और वायुमंडलीय दबाव में होने वाले तीव्र वैश्विक बदलावों के कारण वास्तविक मौसम के आगमन, स्थान और तीव्रता में समय-समय पर आंशिक संशोधन संभव है।

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Abhay Bharati Fast News में लेखक एवं संपादक के रूप में कार्यरत हैं। ये टेक्नोलॉजी, मनोरंजन, खेल और सामयिक घटनाओं से संबंधित विषयों पर समाचार लेखन और संपादन का कार्य करते हैं।इनकी जिम्मेदारी विश्वसनीय स्रोतों से जानकारी एकत्र करना, तथ्यों का सत्यापन करना तथा सामग्री की संपादकीय समीक्षा के बाद प्रकाशन सुनिश्चित करना है।भूमिका: Author & Editor – Bharati Fast News

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