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Home - News - Greater Noida Owl Attack: सोसाइटी में दहशत फैलाने वाले उल्लू रेस्क्यू, कई लोगों पर किया था हमला

Greater Noida Owl Attack: सोसाइटी में दहशत फैलाने वाले उल्लू रेस्क्यू, कई लोगों पर किया था हमला

ग्रेटर नोएडा वेस्ट की ला रेजिडेंशिया सोसाइटी में उल्लुओं के हमलों से लोग परेशान थे। वन विभाग ने अभियान चलाकर उल्लुओं को सुरक्षित रेस्क्यू किया।

Abhay Jeet Singh by Abhay Jeet Singh
15/09/2026
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ग्रेटर नोएडा उल्लू हमला

ग्रेटर नोएडा में उल्लू का खौफ खत्म, रेस्क्यू

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Greater Noida Owl Attack: सोसाइटी में दहशत फैलाने वाले उल्लू रेस्क्यू, कई लोगों पर किया था हमला

शाम ढलते ही बालकनी में जाने से कांपते पैर, हाथ में छतरी और डंडा लेकर लिफ्ट से पार्किंग तक दौड़ते बुजुर्ग, और बच्चों के खेलने पर लगी अघोषित पाबंदी। दिल्ली से सटे ग्रेटर नोएडा वेस्ट (नोएडा एक्सटेंशन) की पॉश हाई-राइज सोसाइटी ‘ला रेजिडेंशिया’ में बीते कुछ दिनों से जो मंजर था, उसने सैकड़ों परिवारों की नींद उड़ा दी थी। आसमान से अचानक होने वाले झपट्टे और पंजों के गहरे घावों ने लोगों को दहशत में डाल दिया था। अब वन विभाग की वाइल्डलाइफ टीम ने बहुचर्चित ग्रेटर नोएडा उल्लू हमला मामले में बड़ी राहत देते हुए रेस्क्यू ऑपरेशन पूरा कर लिया है।

घटना से जुड़े अहम बिंदु

  • ग्रेटर नोएडा वेस्ट स्थित ला रेजिडेंशिया सोसाइटी के टावर-7 और आसपास के ब्लॉक में उल्लुओं के हमलों से फैली थी दहशत।

  • मॉर्निंग और ईवनिंग वॉक पर निकले बुजुर्गों, महिलाओं और डिलीवरी कर्मियों पर हुआ था आक्रामक हमला।

  • कई निवासियों के सिर और गर्दन पर पंजों से गहरे जख्म आए, जिन्हें तुरंत अस्पताल ले जाना पड़ा।

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  • सोसाइटी निवासियों ने आत्मरक्षा के लिए हेलमेट पहनकर और छाता तानकर निकलना शुरू कर दिया था।

  • प्रभागीय वनाधिकारी (DFO) के निर्देश पर वन्यजीव विशेषज्ञों की टीम ने जाल लगाकर उल्लुओं को सुरक्षित रेस्क्यू किया।

  • पक्षी विज्ञानियों के अनुसार यह दुर्लभ हमलावर प्रवृत्ति नहीं, बल्कि घोंसले और अंडों/बच्चों की सुरक्षा का प्राकृतिक दायरा था।

  • रेस्क्यू किए गए पक्षियों की स्वास्थ्य जांच के बाद उन्हें सुरक्षित प्राकृतिक पर्यावास में छोड़ दिया गया है।

ताज़ा घटनाक्रम: ऑपरेशन ‘नाइट विंग्स’ और राहत की सांस

ला रेजिडेंशिया परिसर में बीते तीन हफ्तों से चल रही उठापटक पर आखिरकार विराम लग गया है। वन विभाग, दादरी रेंज और विशेष वाइल्डलाइफ रेस्क्यू सेल ने 48 घंटे के सुनियोजित अभियान के बाद आक्रामक हो चुके दोनों उल्लुओं को जाल की मदद से सुरक्षित पकड़ लिया।

रेस्क्यू के दौरान पशु चिकित्सकों की एक टीम मौके पर तैनात थी ताकि परिंदों को किसी भी प्रकार की शारीरिक चोट न पहुंचे। पकड़े गए उल्लू ‘बार्न आउल’ (Barn Owl) प्रजाति के बताए जा रहे हैं, जो आम तौर पर शांत स्वभाव के होते हैं। प्राथमिक मेडिकल परीक्षण के बाद अधिकारियों ने पुष्टि की है कि पक्षी पूरी तरह स्वस्थ हैं और उन्हें शहर की भीड़भाड़ से दूर वेटलैंड और वन क्षेत्र के प्राकृतिक आवास में पुनर्वासित किया गया है।

रीडर अलर्ट: यदि आपकी बालकनी या एयर कंडीशनर कंप्रेसर के पास किसी दुर्लभ वन्यजीव या पक्षी ने घोंसला बनाया है, तो उन पर स्वयं लाठी या पानी की बौछार से हमला न करें। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत ऐसा करना गैरकानूनी है। तुरंत स्थानीय वन विभाग या आरडब्ल्यूए को सूचित करें।

पृष्ठभूमि: कंक्रीट के जंगल में पक्षियों की बेबसी

ग्रेटर नोएडा वेस्ट का इलाका पिछले एक दशक में खुले खेतों और दलदली जमीनों से बदलकर गगनचुंबी इमारतों के जंगल में तब्दील हो चुका है। ला रेजिडेंशिया जैसी घनी आबादी वाली सोसाइटियों में हजारों परिवार रहते हैं।

टावर के 14वें फ्लोर पर शाफ्ट और बंद पड़ी डक्ट्स के अंदर उल्लुओं के इस जोड़े ने अपना ठिकाना बनाया था। शुरुआत में किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया। लेकिन जैसे ही मौसम बदला और अंडों से चूजे निकलने का समय आया, इन पक्षियों का व्यवहार अचानक क्षेत्रीय (Territorial) और उग्र हो गया। इंसानों की सामान्य आवाजाही को भी वे अपने नवजात बच्चों के लिए खतरा समझने लगे।

प्रत्यक्षदर्शियों की ज़ुबानी: क्या हुआ था उस शाम?

सोसाइटी के निवासी आलोक शर्मा बताते हैं कि वे शाम करीब साढ़े सात बजे ऑफिस से लौटकर पार्किंग से लॉबी की तरफ बढ़ रहे थे। अचानक अंधेरे कोने से एक भारी फड़फड़ाहट हुई और उनके सिर के पिछले हिस्से पर किसी नुकीली चीज से जोरदार प्रहार हुआ। जब तक वे संभलते, खून बहने लगा था।

इसी तरह ब्लॉक-बी में रहने वाली नीलम गुप्ता अपनी पोती को टहला रही थीं, तभी परिंदे ने बच्ची की तरफ डाइव लगाई। नीलम ने समय रहते बच्ची को खींच लिया, लेकिन उनके कंधे पर गहरे खरोंच आ गए। डिलीवरी बॉयज ने डर के मारे टावर के अंदर ऑर्डर डिलीवर करने से मना कर दिया था। सोसाइटी के व्हाट्सएप ग्रुप्स में सीसीटीवी फुटेज साझा होने लगे, जिनमें परिंदे लोगों पर गोता लगाते साफ दिख रहे थे। माहौल ऐसा बना कि लोग दिन के उजाले में भी धूप का चश्मा और सुरक्षा हेलमेट लगाकर बालकनी में कपड़े सुखाने जाने लगे।

क्या कहते हैं वन्यजीव विशेषज्ञ?

प्रसिद्ध ऑर्निथोलॉजिस्ट (पक्षी विज्ञानी) और शहरी जैव विविधता विश्लेषकों का मानना है कि इस घटना को सनसनीखेज बनाने की जगह वैज्ञानिक नजरिए से समझा जाना चाहिए। उल्लू कभी भी अकारण इंसानों पर हमला नहीं करते।

वन्यजीव विशेषज्ञों के मुताबिक, जब पक्षियों के घोंसले में चूजे होते हैं, तो वे अपनी सीमा को सुरक्षित रखने के लिए ‘डाइव-बॉम्बिंग’ (ऊपर से झपट्टा मारना) तकनीक अपनाते हैं। यह उनका रक्षात्मक तंत्र है, कोई आक्रामक शिकार नहीं। ऊंची इमारतों की खुली एसी डक्ट्स उनके लिए प्राकृतिक चट्टानों जैसी गुहाओं (Cavities) का आभास कराती हैं, जहां वे शरण लेते हैं।

विवरणसामान्य अवलोकनविशेषज्ञ परामर्श
प्रजातिबार्न आउल / स्पॉटेड आउलेटकानूनी रूप से संरक्षित वन्यजीव (शेड्यूल संरक्षित)
हमले का प्राथमिक कारणशिकार की मंशा नहींअंडों और नवजात चूजों की आत्मरक्षात्मक सुरक्षा
हमले का समयमुख्य रूप से गोधूलि वेला (डस्क) और भोररोशनी कम होने पर दृष्टि और सक्रियता चरम पर
जनता के लिए सुरक्षा उपायलाठी से मारना या पत्थर फेंकनाछाते का प्रयोग, एसी शाफ्ट पर जाली लगवाना

प्रशासनिक कदम और आधिकारिक बयान

घटना की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय प्रशासन और वन विभाग ने त्वरित कार्रवाई की। दादरी वन क्षेत्राधिकारी ने बयान जारी कर स्पष्ट किया कि रेस्क्यू टीम ने मानवीय संवेदना और वन्यजीव सुरक्षा दोनों को प्राथमिकता दी।

गौतमबुद्ध नगर वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार:

“हमारी प्राथमिक चिंता निवासियों को चोट से बचाना और साथ ही इन निरीह पक्षियों को बिना किसी नुकसान के सुरक्षित निकालना था। हमने आधुनिक नायलॉन मिस्ट-नेट्स का इस्तेमाल किया। सोसाइटी प्रबंधन को भी एडवाइजरी जारी की गई है कि वे खुली डक्ट्स और शाफ्ट्स पर बर्ड-नेटिंग करवाएं ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न घटें।”

घटनाक्रम: कब क्या हुआ?

तारीख / समयघटनाक्रम का विवरणप्रशासनिक प्रतिक्रिया
12 अगस्त 2026पहली बार निवासियों पर संदिग्ध गोता लगाने की शिकायतस्थानीय आरडब्ल्यूए ने आंतरिक नोटिस जारी किया
18 अगस्त 2026दो डिलीवरी एक्जीक्यूटिव और एक बुजुर्ग घायलप्राथमिक चिकित्सा दी गई, सीसीटीवी फुटेज जांची गई
25 अगस्त 2026दहशत चरम पर, लोगों ने लाठी-हेलमेट का सहारा लियाआरडब्ल्यूए ने औपचारिक रूप से वन विभाग को पत्र लिखा
28 अगस्त 2026वन विभाग की टीम ने इलाके का प्रारंभिक मुआयना कियाघोंसले और चूजों की लोकेशन ट्रैक की गई
01 सितंबर 2026संयुक्त रेस्क्यू अभियान शुरू (ऑपरेशन सुरक्षित पंख)विशेषज्ञों ने दोनों उल्लुओं को सुरक्षित जाल में पकड़ा
02 सितंबर 2026स्वास्थ्य परीक्षण संपन्नपक्षियों को प्राकृतिक वन्य पर्यावास में छोड़ा गया

नागरिकों और बच्चों पर असर: दिनचर्या में आया बदलाव

इस अप्रत्याशित संकट ने हाई-राइज कल्चर की कमजोरियों को उजागर कर दिया। सबसे ज्यादा असर बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों पर पड़ा:

  • बच्चों का खेल बंद: पार्क और खुले पोडियम वीरान हो गए। स्विमिंग पूल और स्केटिंग रिंग के आसपास सन्नाटा पसर गया।

  • पालतू जानवरों का संकट: लोग अपने पालतू कुत्तों को बाहर घुमाने ले जाने से कतराने लगे, क्योंकि पक्षी छोटे जानवरों पर भी झपट सकते थे।

  • मानसिक तनाव: अंधेरा होते ही बालकनी की लाइटें बंद रखने की सलाह दी गई, जिससे घरों में खिड़कियां बंद रहने से घुटन भरा माहौल बना।

पर्यावरण संतुलन और भविष्य की चुनौतियाँ

शहरीकरण की अंधी दौड़ ने वन्यजीवों के प्राकृतिक गलियारों को छीन लिया है। ग्रेटर नोएडा, हिंडन और यमुना के खादर क्षेत्रों से घिरा हुआ है। जब दलदल और जंगल कंक्रीट टावरों में बदलेंगे, तो जीव-जंतु अपने अस्तित्व के लिए इन्हीं इमारतों की शरण लेंगे।

उल्लू प्राकृतिक रूप से किसानों और शहरी क्षेत्रों के लिए मित्र कीट-नियंत्रक (Pest Controller) हैं। एक उल्लू का जोड़ा साल भर में हजारों चूहों और जहरीले कीड़ों को खाकर महामारियों का फैलाव रोकता है। यदि हम अंधाधुंध तरीके से इन्हें खदेड़ेंगे, तो शहरों में चूहों और संक्रामक रोगों की तादाद अनियंत्रित रूप से बढ़ जाएगी। भविष्य में टाउन प्लानर्स को ‘बर्ड-सेफ आर्किटेक्चर’ पर ध्यान देना होगा।

निवासियों और प्रकृति प्रेमियों के लिए जरूरी दिशा-निर्देश

यदि आपके आवासीय परिसर में भी उल्लू, चील या अन्य शिकारी पक्षी डेरा डालते हैं, तो घबराने की जगह इन नियमों का पालन करें:

  • अंधेरे में सिर ढकें: यदि किसी क्षेत्र में पक्षी के घोंसले की पुष्टि हो, तो वहां से गुजरते समय कैप, हुडी या छाते का इस्तेमाल करें।

  • सीधे आंखों में टॉर्च न मारें: उल्लुओं की आंखें रात में अत्यधिक संवेदनशील होती हैं। तेज फ्लैशलाइट उन्हें विचलित और आक्रामक बना सकती है।

  • कचरा प्रबंधन सुधारें: खुले में पड़ा कचरा चूहों को आकर्षित करता है, और चूहे उल्लुओं का मुख्य भोजन हैं। बेसमेंट और डंपिंग यार्ड साफ रखें।

  • घोंसलों से छेड़छाड़ न करें: भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत उल्लू संरक्षित श्रेणी में आते हैं। उन्हें मारना, पकड़ना या उनके अंडों को नुकसान पहुंचाना गैर-जमानती अपराध है।

निष्कर्ष

ला रेजिडेंशिया में हुआ ग्रेटर नोएडा उल्लू हमला कोई असामान्य हिंसक घटना नहीं, बल्कि प्रकृति और अनियोजित शहरी फैलाव के बीच उपजे अंतर्द्वंद की चेतावनी है। वन विभाग की सतर्कता ने स्थिति को समय रहते संभाल लिया और किसी बड़े हादसे से बचा लिया। अब यह नागरिकों और सोसाइटी प्रबंधन का दायित्व है कि वे साझा जीवन के नियमों को समझें।

समस्या का हल वन्यजीवों को शत्रु मानने में नहीं, बल्कि वैज्ञानिक सुरक्षा उपायों और संवाद में निहित है। किसी भी आपात स्थिति में वन विभाग की हेल्पलाइन पर तुरंत संपर्क करें और अफवाहों पर ध्यान न दें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

प्र.1: क्या ग्रेटर नोएडा में उल्लुओं का हमला सामान्य घटना है?

उत्तर: नहीं, यह अत्यंत दुर्लभ घटना है। उल्लू स्वभाव से शर्मीले और एकांतप्रिय होते हैं। ला रेजिडेंशिया में हमला केवल इसलिए हुआ क्योंकि उनके घोंसले और नवजात बच्चों के बेहद करीब मानवीय हलचल बढ़ गई थी, जिसे उन्होंने खतरा समझा।

प्र.2: क्या उल्लू इंसानों के लिए जानलेवा साबित हो सकते हैं?

उत्तर: उल्लू इंसानों का शिकार नहीं करते और न ही वे जानलेवा होते हैं। हालांकि, उनके नुकीले पंजे और चोंच से त्वचा पर गहरे कट लग सकते हैं, जिससे गंभीर संक्रमण या टिटनेस का खतरा हो सकता है।

प्र.3: उल्लू के झपट्टे मारने पर प्राथमिक उपचार क्या होना चाहिए?

उत्तर: घाव को तुरंत बहते पानी और एंटीसेप्टिक साबुन से अच्छी तरह धोएं। उस पर एंटीबायोटिक क्रीम लगाएं और बिना देरी किए नजदीकी अस्पताल जाकर टिटनेस और आवश्यक दवाओं के लिए डॉक्टर से परामर्श लें।

प्र.4: ग्रेटर नोएडा में घायल या भटके हुए वन्यजीव दिखने पर कहां संपर्क करें?

उत्तर: आप उत्तर प्रदेश वन विभाग के एकीकृत हेल्पलाइन नंबर या स्थानीय जिला वनाधिकारी (DFO) कार्यालय के कंट्रोल रूम पर सूचित कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त स्थानीय पुलिस डायल 112 भी वन विभाग से समन्वय स्थापित कराती है।

प्र.5: क्या घरों की बालकनी में उल्लू का आना अपशकुन माना जाता है?

उत्तर: यह पूरी तरह से अंधविश्वास है। पारिस्थितिकी तंत्र में उल्लू बेहद उपयोगी पक्षी हैं जो चूहों और कीटों की आबादी नियंत्रित रखते हैं। वैज्ञानिक और पर्यावरणीय दृष्टि से इनका आसपास होना पर्यावरण के लिए लाभकारी है।

प्र.6: ऊंची इमारतों में पक्षियों के घोंसले रोकने के सुरक्षित उपाय क्या हैं?

उत्तर: बालकनी, पाइप डक्ट और एसी कंप्रेसर के खुले हिस्सों पर उच्च गुणवत्ता वाली नायलॉन बर्ड-नेटिंग लगवाएं। डक्ट्स की नियमित सफाई रखें ताकि परिंदों को वहां एकांत और अंधेरा न मिले।

प्र.7: क्या उल्लुओं को अपने स्तर पर भगाने के लिए पटाखे या पत्थर का उपयोग कर सकते हैं?

उत्तर: बिल्कुल नहीं। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत उल्लू संरक्षित पक्षी हैं। पटाखों या पत्थरों से उन्हें चोट पहुंचाना कानूनी अपराध है जिसके लिए भारी जुर्माना और जेल की सजा हो सकती है।

प्र.8: रेस्क्यू के बाद पकड़े गए उल्लुओं का क्या किया जाता है?

उत्तर: रेस्क्यू किए गए पक्षियों को पहले पशु चिकित्सकों की निगरानी में क्वारंटीन रखकर उनकी स्वास्थ्य जांच की जाती है। स्वस्थ पाए जाने पर उन्हें इंसानी आबादी से दूर जंगलों या अभयारण्यों में सुरक्षित छोड़ दिया जाता है।

अस्वीकरण (Disclaimer)

यह लेख पर्यावरण संरक्षण, वन्यजीव व्यवहार अध्ययन और आधिकारिक प्रशासनिक स्रोतों से प्राप्त प्राथमिक सूचनाओं के आधार पर जन-जागरूकता के उद्देश्य से तैयार किया गया है। किसी भी वन्यजीव से जुड़ी आपात स्थिति में स्वयं कदम उठाने के बजाय सदैव अधिकृत वन विभाग एवं प्रमाणित वन्यजीव रेस्क्यू संस्थाओं से ही संपर्क करें।

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Abhay Jeet Singh

Abhay Bharati Fast News में लेखक एवं संपादक के रूप में कार्यरत हैं। ये टेक्नोलॉजी, मनोरंजन, खेल और सामयिक घटनाओं से संबंधित विषयों पर समाचार लेखन और संपादन का कार्य करते हैं।इनकी जिम्मेदारी विश्वसनीय स्रोतों से जानकारी एकत्र करना, तथ्यों का सत्यापन करना तथा सामग्री की संपादकीय समीक्षा के बाद प्रकाशन सुनिश्चित करना है।भूमिका: Author & Editor – Bharati Fast News

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