E20 Petrol पर वैज्ञानिकों की नाराजगी: सरकार को पत्र, पानी-फसल-भूजल पर उठाए सवाल
ऊर्जा आत्मनिर्भरता और कार्बन उत्सर्जन घटाने के नाम पर जिस महत्वाकांक्षी योजना को हरित क्रांति का अगला अध्याय बताया जा रहा था, वही आज देश के शीर्ष पर्यावरणविदों और कृषि वैज्ञानिकों के निशाने पर आ गई है। पेट्रोल पंपों पर 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रित ईंधन (E20) का प्रसार जैसे-जैसे रफ्तार पकड़ रहा है, वैसे-वैसे देश की उपजाऊ जमीन और पाताल में सिमटते पानी की हकीकत ने खतरे की घंटी बजा दी है। देश के वरिष्ठ वैज्ञानिकों, जल-विशेषज्ञों और नीति विश्लेषकों के एक संयुक्त पैनल ने केंद्र सरकार को एक कड़ा पत्र लिखकर नीति पर तत्काल पुनर्विचार करने की मांग की है।
इस संवेदनशील पत्र में वैज्ञानिकों ने सीधे सवाल खड़े किए हैं कि क्या गाड़ियों के पहिये दौड़ाने के लिए हम आने वाली पीढ़ियों के हलक का पानी और गरीबों की थाली का अनाज दांव पर लगा रहे हैं? इस कदम के साथ ही E20 पेट्रोल विवाद अब केवल ऑटोमोबाइल कंपनियों और माइलेज तक सीमित न रहकर देश की खाद्य सुरक्षा, भूजल दोहन और कृषि पारिस्थितिकी का सबसे बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बन गया है। सरकार जहां इसे किसानों की आमदनी बढ़ाने और तेल आयात बिल घटाने का सुरक्षा कवच बता रही है, वहीं वैज्ञानिकों का कहना है कि यह “हरित मुखौटे के पीछे छिपा पारिस्थितिक संकट” है।
मुख्य बिंदु (Key Highlights)
वैज्ञानिकों का संयुक्त पत्र: कृषि, जल संरक्षण और पर्यावरण विज्ञान से जुड़े विशेषज्ञों ने पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय और नीति आयोग को विस्तृत वैज्ञानिक समीक्षा पत्र भेजा है।
भूजल का अंधाधुंध दोहन: रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है कि 1 लीटर एथेनॉल (गन्ने व धान आधारित) के उत्पादन में लगभग 2,500 से 3,000 लीटर तक पानी की अप्रत्यक्ष खपत (वॉटर फुटप्रिंट) होती है, जिससे नलकूप तेजी से सूख रहे हैं।
खाद्य बनाम ईंधन (Food vs Fuel) का टकराव: भारतीय खाद्य निगम (FCI) के अधिशेष चावल और मक्के को बड़े पैमाने पर डिस्टिलरीज में डायवर्ट करने से भविष्य में पोषण सुरक्षा और अनाज महंगाई बढ़ने की आशंका जताई गई है।
मक्का और धान की मोनोकल्चर खेती: एथेनॉल कंपनियों की बढ़ती मांग के चलते किसान दालों और तिलहनों की जगह पानी खींचने वाली फसलों की तरफ झुक रहे हैं, जिससे फसल चक्र बिगड़ रहा है।
सरकारी पक्ष और स्पष्टीकरण: सरकार का तर्क है कि डिस्टिलरीज में केवल प्रमाणित सरप्लस अनाज का उपयोग हो रहा है और अब पानी बचाने वाले मक्के पर 40% से अधिक आपूर्ति शिफ्ट की जा चुकी है।
वाहनों की अनुकूलता पर भी संशय: ऑटोमोबाइल इंजन में रबर पार्ट्स के खराब होने और 5-7% माइलेज की गिरावट को लेकर वाहन मालिकों और विशेषज्ञों में पहले से ही असंतोष है।
स्वतंत्र ऑडिट की मांग: वैज्ञानिकों ने मांग की है कि पूरे E20 कार्यक्रम का किसी स्वतंत्र बहु-विषयक वैज्ञानिक आयोग से सामाजिक और पर्यावरणीय ‘लाइफ-साइकिल असेसमेंट’ (LCA) कराया जाए।
ताजा अपडेट: वैज्ञानिकों की चिट्ठी पर मंत्रालय की हलचल
वैज्ञानिकों के पत्र के सार्वजनिक होते ही नीति आयोग और पेट्रोलियम मंत्रालय के गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। पत्र में मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के मराठवाड़ा जैसे जल-तनावग्रस्त (Water-Stressed) क्षेत्रों के आंकड़ों का हवाला दिया गया है। इन इलाकों में भूजल स्तर पहले से ही डार्क जोन (अत्यधिक दोहन) में पहुंच चुका है, और एथेनॉल डिस्टिलरीज की निरंतर मांग ने किसानों को अत्यधिक सिंचाई वाली फसलें उगाने पर मजबूर कर दिया है।
मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने अनौपचारिक प्रतिक्रिया में कहा है कि सरकार ने धान से निर्भरता घटाकर मोटे अनाजों और मक्के की ओर कदम बढ़ा दिए हैं। साथ ही डिस्टिलरीज को ‘जीरो लिक्विड डिस्चार्ज’ (ZLD) सिस्टम अपनाने के निर्देश दिए गए हैं ताकि पानी का पुनर्चक्रण हो सके। हालांकि, वैज्ञानिकों का तर्क है कि डिस्टिलरी के भीतर लगने वाले 3 से 5 लीटर पानी की बात करके सरकार फसल उगाने में लगने वाले हजारों लीटर सिंचाई जल के सवाल से आंखें नहीं चुरा सकती।
बैकग्राउंड स्टोरी: E5 से E20 तक का सफर और जमीनी सच्चाई
भारत में एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम की शुरुआत 2001 में पायलट प्रोजेक्ट और 2006 में 5% (E5) मिश्रण के साथ हुई थी। शुरुआती वर्षों में इसका आधार मुख्य रूप से गन्ने का शीरा (C-Heavy and B-Heavy Molasses) हुआ करता था। लेकिन जब सरकार ने 2025-26 तक 20% एथेनॉल सम्मिश्रण (E20) का आक्रामक लक्ष्य तय किया, तो केवल गन्ने के शीरे से यह मांग पूरी होना असंभव हो गया।
रोचक तथ्य (Interesting Fact): भारत को 20% ब्लेंडिंग का लक्ष्य हासिल करने के लिए सालाना 1,000 करोड़ लीटर से अधिक एथेनॉल की आवश्यकता है। इस भारी भरकम लक्ष्य को पूरा करने के लिए सरकार को अनाज आधारित (Grain-based) डिस्टिलरीज को बड़े पैमाने पर सब्सिडी और रियायती दरों पर अनाज उपलब्ध कराना पड़ा।
इसके बाद नीति में बदलाव कर टूटे हुए चावल, एफसीआई के चावल और मक्के को एथेनॉल उत्पादन के लिए अनुमोदित किया गया। नतीजा यह हुआ कि जहां 2023-24 में एथेनॉल उत्पादन में एफसीआई चावल की हिस्सेदारी नगण्य थी, वहीं हाल के वर्षों में यह बढ़कर 24% से ऊपर पहुंच गई। यहीं से खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण वैज्ञानिकों के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गईं।
वैज्ञानिकों ने क्या आरोप लगाए? तीन सबसे बड़े खतरे
वैज्ञानिकों के पत्र में किसी भावनात्मक विरोध के बजाय ठोस सांख्यिकीय और पारिस्थितिक आंकड़े दिए गए हैं, जिन्हें तीन प्रमुख श्रेणियों में समझा जा सकता है:
1. भूजल का महा-संकट (Groundwater Depletion)
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि 1 किलोग्राम धान पैदा करने में लगभग 3,000 से 4,000 लीटर भूजल खर्च होता है। जब उसी धान से बने चावल को एथेनॉल भट्ठियों में झोंका जाता है, तो वास्तव में हम पानी को पेट्रोल की टंकी में जला रहे होते हैं। पंजाब और हरियाणा में 80% ब्लॉक पहले ही ‘अति-दोहित’ (Over-exploited) श्रेणी में हैं, ऐसे में यह नीति पानी के विनाश को संस्थागत रूप दे रही है।
2. थाली का अनाज बनाम टंकी का ईंधन (Food Security Paradox)
भारत ग्लोबल हंगर इंडेक्स (GHI) और बाल कुपोषण के पैमानों पर पहले से ही संघर्ष कर रहा है। वैज्ञानिकों ने सवाल उठाया कि जब देश की 80 करोड़ जनता को मुफ्त राशन योजना पर निर्भर रहना पड़ रहा है, तब पोषण सुरक्षा देने वाले मोटे अनाजों और चावल को ईंधन बनाने के लिए प्राइवेट डिस्टिलरी मालिकों को सस्ती दरों पर देना नैतिक और आर्थिक रूप से कितना उचित है?
3. फसल विविधीकरण (Crop Diversification) को धक्का
दशकों से यह प्रयास किया जा रहा था कि किसान धान-गेहूं के दुष्चक्र से बाहर निकलकर दलहन, तिलहन और सब्जियों की खेती करें ताकि आयात घटने के साथ मिट्टी की सेहत सुधरे। लेकिन एथेनॉल मिलों द्वारा दिए जाने वाले निश्चित खरीद मूल्य (Assured Price) के कारण किसान दोबारा धान और भारी जल खपत वाली फसलों के विस्तार की ओर लौट रहे हैं।
आधिकारिक आंकड़े: जल खपत और एथेनॉल आपूर्ति संरचना
वैज्ञानिकों और विभिन्न स्वतंत्र संस्थानों द्वारा प्रस्तुत जल पदचिह्न (Water Footprint) और एथेनॉल उत्पादन मैट्रिक्स:
| कच्चा माल (Feedstock) | 1 लीटर एथेनॉल में औसतन पानी की खपत (सिंचाई सहित) | राष्ट्रीय एथेनॉल आपूर्ति में हिस्सेदारी (%) | पर्यावरणीय जोखिम स्तर |
| गन्ने का रस / सिरप | 2,800 से 3,200 लीटर | ~35% | अति-संवेदनशील (गंभीर भूजल संकट) |
| एफसीआई / अधिशेष चावल | 3,500 से 4,200 लीटर | ~24% | खतरनाक (खाद्य चक्र पर सीधा प्रभाव) |
| क्षतिग्रस्त मक्का (Maize) | 1,200 से 1,800 लीटर | ~38% | मध्यम (कम पानी, लेकिन भूमि डायवर्जन) |
| 2G बायोमास (कृषि अवशेष/पराली) | 150 से 250 लीटर | < 3% | आदर्श एवं टिकाऊ (धीमी प्रगति) |
विशेषज्ञ नजरिया (Expert View): प्रख्यात जल विशेषज्ञ और पर्यावरणविद डॉ. राजेंद्र शेखर का कहना है:
“हम ब्राजील की नकल करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि ब्राजील एक जल-अधिशेष (Water-surplus) देश है और वहां गन्ने की खेती वर्षा आधारित अमेजन बेसिन के अनुकूल क्षेत्रों में होती है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा भूजल दोहन करने वाला देश है। यदि हम जीवाश्म ईंधन से आयात घटाने के लिए अपने जलस्रोतों को ही सुखा देंगे, तो आने वाले 15 वर्षों में पीने के पानी का आयात करना पड़ेगा।”
सरकार का तर्क: ऊर्जा आत्मनिर्भरता और किसानों की आय
इस विवाद के बीच पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय और नीति आयोग का पक्ष भी बेहद मजबूत आर्थिक तर्कों पर आधारित है:
विदेशी मुद्रा की भारी बचत: भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 85% से अधिक आयात करता है। 20% ब्लेंडिंग के जरिए देश सालाना ₹40,000 करोड़ से अधिक की विदेशी मुद्रा बचा रहा है।
किसानों को सीधा भुगतान: सरकार के अनुसार, पिछले एक दशक में एथेनॉल खरीद के जरिए किसानों और डिस्टिलरी ऑपरेटरों को ₹1.66 लाख करोड़ से अधिक का भुगतान किया गया है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सहारा मिला है।
कच्चे तेल के झटकों से ढाल: जब वैश्विक युद्धों के कारण कच्चे तेल के भाव $100 प्रति बैरल पार कर जाते हैं, तब घरेलू एथेनॉल पेट्रोल के दामों को स्थिर रखने में ‘इंश्योरेंस पॉलिसी’ का काम करता है।
अनाज सुरक्षा से कोई समझौता नहीं: मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि जनवितरण प्रणाली (PDS) और बफर स्टॉक की अनिवार्य जरूरतें पूरी होने के बाद ही अतिरिक्त सरप्लस स्टॉक को इथेनॉल के लिए आवंटित किया जाता है।
महत्वपूर्ण नोट (Important Note): सरकार ने 2G (सेकंड जनरेशन) एथेनॉल संयंत्रों की स्थापना में निवेश बढ़ाया है जो पराली, बांस और कृषि कचरे से ईंधन बनाते हैं। हालांकि, इनकी ऊंची लागत और जटिल तकनीक के कारण अभी इनसे कुल मांग का 3% भी पूरा नहीं हो पा रहा है।
महत्वपूर्ण तिथियां और नीतिगत पड़ाव (Timeline Table)
| वर्ष / तारीख | नीतिगत घटनाक्रम / माइलस्टोन | संबंधित प्रभाव |
| 2006 | 5% एथेनॉल सम्मिश्रण (E5) की शुरुआत | केवल गन्ने के शीरे पर आधारित सीमित पायलट |
| जून 2018 | राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति (National Biofuel Policy) स्वीकृत | खाद्यान्नों और मक्के के उपयोग को सशर्त मंजूरी |
| 2021 | नीति आयोग का रोडमैप | E20 लक्ष्य को 2030 से घटाकर 2025-26 किया गया |
| दिसंबर 2025 | 20% राष्ट्रीय सम्मिश्रण स्तर की प्राप्ति | पेट्रोल पंपों पर E20 ईंधन का अनिवार्य विस्तार |
| जुलाई 2026 | मंत्रालय द्वारा भ्रांतियों पर 10-सूत्रीय खंडन जारी | इंजन क्षति और जल बर्बादी के आरोपों पर सरकार की सफाई |
| अगस्त-सितंबर 2026 | वैज्ञानिकों का सरकार को औपचारिक पत्र | भूजल, फसल विविधीकरण और स्वतंत्र ऑडिट की औपचारिक मांग |
आम नागरिक, किसान और छात्रों पर प्रभाव
इस विवाद का असर हर तबके की जेब, स्वास्थ्य और जीवन से सीधे जुड़ा हुआ है:
मध्यम वर्ग और वाहन चालक: गाड़ियों के माइलेज में 6% तक की कमी के कारण प्रति किलोमीटर चलने की लागत बढ़ गई है। इसके अलावा 2023 से पहले बने वाहनों के फ्यूल पाइप्स और इंजेक्टर में जंग लगने की शिकायतों से रिपेयरिंग का खर्च बढ़ रहा है।
छोटे और सीमांत किसान: बड़े कॉर्पोरेट और डिस्टिलरी मालिक सीधे बड़े सप्लायर्स से मक्का और धान खरीदते हैं, जिससे बिचौलियों का मुनाफा तो बढ़ा है लेकिन छोटे किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) का वास्तविक फायदा सीमित ही मिल पा रहा है।
भविष्य की खाद्य मुद्रास्फीति: यदि अनाज का बड़ा हिस्सा पेट्रोल बनाने में खपेगा, तो पोल्ट्री उद्योग (जो मुर्गियों के दाने के लिए मक्के पर निर्भर है) में लागत बढ़ेगी, जिससे अंडे, चिकन और अंततः गेहूं-चावल के दाम आम आदमी के लिए बढ़ सकते हैं।
पाठक अलर्ट (Reader Alert): यदि आपकी कार या बाइक 2023 से पहले की निर्मित है और E20-अनुकूल (Material Compliant) नहीं है, तो नियमित सर्विसिंग के दौरान फ्यूल लाइन, गैसकेट और स्पार्क प्लग्स की जांच अवश्य कराएं ताकि एथेनॉल से होने वाले संभावित रबर डिग्रेडेशन से बचा जा सके।
भविष्य का परिदृश्य (Future Impact): आगे का रास्ता क्या है?
वैज्ञानिकों के इस कड़े पत्र के बाद सरकार के सामने नीतिगत संतुलन बनाने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है:
फ्लेक्स-फ्यूल बनाम 2G बायोफ्यूल: सरकार को 1G (अनाज आधारित) एथेनॉल के विस्तार पर ब्रेक लगाकर पराली और औद्योगिक कचरे से बनने वाले 2G एथेनॉल पर भारी सब्सिडी देनी होगी ताकि भूजल पर दबाव न पड़े।
इलेक्ट्रिक मोबिलिटी (EV) की तरफ शिफ्ट: आलोचकों का तर्क है कि कृषि संसाधनों को ईंधन में झोंकने के बजाय सौर ऊर्जा चालित इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) को तेज गति से अपनाना लंबे समय के लिए अधिक टिकाऊ और शून्य-जल विकल्प है।
पारदर्शी लेबलिंग का नियम: पेट्रोल पंपों पर यह स्पष्ट लिखा होना चाहिए कि किस डिस्पेंसर में कितना प्रतिशत एथेनॉल है, ताकि उपभोक्ता को अपनी गाड़ी की क्षमता के अनुसार निर्णय लेने का अधिकार मिल सके।
नागरिकों और किसानों को क्या करना चाहिए?
फसल चयन में सतर्कता बरतें: किसान भाई केवल अल्पकालिक मुनाफे के लिए अपनी उपजाऊ जमीन को अत्यधिक पानी वाली फसलों में न झोंकें; ड्रिप इरिगेशन (टपक सिंचाई) और फसल चक्र का पालन अनिवार्य रूप से करें।
गाड़ी के रख-रखाव पर ध्यान दें: अपनी गाड़ी के यूजर मैनुअल को देखकर जांचें कि वह E10, E12 या E20 सर्टिफाइड है या नहीं। यदि गाड़ी पुरानी है, तो लंबे समय तक टैंक में पेट्रोल जमा न रहने दें।
जल संरक्षण में सहयोग करें: भूजल संकट केवल नीतिगत विफलता नहीं है, बल्कि व्यक्तिगत स्तर पर भी वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) अपनाना समय की सबसे बड़ी मांग है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. E20 पेट्रोल विवाद का मुख्य कारण क्या है?
E20 पेट्रोल विवाद का मुख्य कारण वैज्ञानिकों द्वारा उठाए गए वे सवाल हैं, जिनके मुताबिक 20% एथेनॉल बनाने के लिए भारी मात्रा में भूजल और खाद्य फसलों (चावल व मक्का) का दोहन किया जा रहा है, जिससे भविष्य में जल और अन्न संकट गहरा सकता है।
2. वैज्ञानिकों ने सरकार को लिखे पत्र में क्या मांग की है?
वैज्ञानिकों ने मांग की है कि नीति की स्वतंत्र समीक्षा की जाए, धान और एफसीआई चावल के एथेनॉल डायवर्जन को तुरंत रोका जाए, और संपूर्ण एथेनॉल चक्र का भूजल प्रभाव मूल्यांकन (Groundwater Impact Assessment) कराया जाए।
3. क्या E20 पेट्रोल से गाड़ियों के इंजन को नुकसान पहुंचता है?
सरकार और वाहन निर्माताओं के अनुसार 2023 के बाद बने नए वाहन पूरी तरह E20 अनुकूल हैं। हालांकि, 2023 से पहले बने पुराने वाहनों में रबर के पार्ट्स, वाल्व और फ्यूल होज पाइप में समय से पहले खराबी और 5-6% तक माइलेज गिरने की आशंका रहती है।
4. क्या एथेनॉल उत्पादन से देश की खाद्य सुरक्षा को खतरा है?
मंत्रालय का दावा है कि केवल राष्ट्रीय बफर स्टॉक और राशन व्यवस्था के बाद बचा हुआ अधिशेष (Surplus) अनाज ही डिस्टिलरीज को दिया जाता है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि अनाज की यह मांग मंडियों में खाद्यान्न की कीमतें बढ़ा सकती है।
5. 1 लीटर एथेनॉल बनाने में कितना पानी खर्च होता है?
फसल की कुल सिंचाई और प्रसंस्करण को मिलाकर 1 लीटर गन्ना आधारित एथेनॉल में लगभग 2,800 से 3,200 लीटर और धान आधारित में 3,500 लीटर से अधिक पानी का पदचिह्न (Water Footprint) दर्ज होता है।
6. सरकार E20 सम्मिश्रण पर इतना जोर क्यों दे रही है?
सरकार का मुख्य उद्देश्य कच्चे तेल के भारी आयात बिल को कम कर विदेशी मुद्रा बचाना, कार्बन उत्सर्जन में कमी लाना और किसानों व डिस्टिलरी उद्योग को आर्थिक संबल प्रदान करना है।
7. क्या पेट्रोल पंपों पर E20 की जगह सादा पेट्रोल मिल सकता है?
अधिकांश बड़े शहरों के पेट्रोल पंपों पर अब मानक रूप से E20 मिश्रित पेट्रोल ही उपलब्ध कराया जा रहा है, हालांकि कुछ कंपनियों के प्रीमियम पेट्रोल (High Octane) में मिश्रण के स्तर भिन्न हो सकते हैं।
8. 2G एथेनॉल क्या है और यह बेहतर क्यों माना जाता है?
2G एथेनॉल अनाज या गन्ने के बजाय पराली, कृषि अवशेष, पत्तियों और नगरपालिका कचरे से बनाया जाता है। इसमें खाद्य सुरक्षा और भूजल दोहन का कोई खतरा नहीं होता।
निष्कर्ष (Conclusion)
ऊर्जा आत्मनिर्भरता किसी भी संप्रभु राष्ट्र के लिए आवश्यक लक्ष्य हो सकती है, लेकिन इसकी कीमत आने वाली पीढ़ियों के प्राकृतिक संसाधनों की बलि देकर नहीं चुकाई जा सकती। वैज्ञानिकों की यह चेतावनी सरकार के लिए एक नीतिगत आईना है कि पर्यावरण संरक्षण के नाम पर उठाया गया कदम खुद एक नया पर्यावरणीय संकट न बन जाए।
अब समय आ गया है कि नीति निर्माता हठधर्मिता छोड़कर कृषि वैज्ञानिकों, जल-विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों को एक मंच पर लाएं। भारत को ऐसे जैव ईंधन मॉडल की जरूरत है जो अन्न और पानी की कीमत पर न चले, बल्कि पराली और हरित कचरे के वैज्ञानिक उपयोग से ऊर्जा पैदा करे। देश के जागरूक नागरिकों और किसानों को भी इस बहस पर पैनी नजर रखनी चाहिए। आधिकारिक नीतिगत परिवर्तनों और तकनीकी सूचनाओं के लिए पेट्रोलियम मंत्रालय एवं कृषि विभाग के आधिकारिक पोर्टलों पर ही भरोसा करें।
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह समाचार विश्लेषण कृषि व जल वैज्ञानिकों के सार्वजनिक पत्रों, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा जारी 10-सूत्रीय खंडन, नीति आयोग की रिपोर्टों और ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री के अध्ययनों के आधार पर निष्पक्ष पत्रकारिता मानकों के तहत तैयार किया गया है। सरकारी नीतियों और ईंधन मानकों में किसी भी बदलाव की आधिकारिक पुष्टि भारत के राजपत्र और संबंधित मंत्रालयों के आदेशों के अधीन है।





























