जय गणेश
Ganesh Chaturthi 2026: घर-घर विराजेंगे बप्पा, जानें ग्रहों की चाल, पूजा विधि और शुभ मुहूर्त
ढोल-ताशों की गूंजती थाप और “गणपति बप्पा मोरया” के गगनभेदी जयकारों के साथ देश भर में रिद्धि-सिद्धि के दाता का स्वागत करने की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि यानी 14 सितंबर को देवों के प्रथम पूज्य भगवान श्रीगणेश घर-घर और भव्य पूजा पंडालों में विराजेंगे। पंचांगीय गणनाओं के अनुसार, इस वर्ष गणेश उत्सव पर ग्रहों और नक्षत्रों का अत्यंत दुर्लभ महासंयोग निर्मित हो रहा है, जो साधकों के जीवन से विघ्नों का नाश कर स्थायी समृद्धि के द्वार खोलेगा। धार्मिक नियमों के अनुरूप भगवान लंबोदर का प्राकट्य दोपहर के समय हुआ था, इसलिए वैदिक मान्यताओं में गणेश चतुर्थी 2026 पूजा विधि के अंतर्गत मध्याह्न काल में ही मूर्ति स्थापना और प्राण-प्रतिष्ठा का शास्त्रीय विधान माना गया है।
घर के मंदिर में बप्पा को बिठाने से पहले चौघड़िया, अभिजीत मुहूर्त और चतुर्थी तिथि के प्रारंभ व समापन के समय का सूक्ष्म गणित समझना जरूरी होता है। पूजा की चौकी किस दिशा में सजेगी, कलश स्थापना का नियम क्या है, दूर्वा की कितनी गांठें अर्पित करनी हैं और किस विशेष समय में चंद्र दर्शन से बचना चाहिए—इन सभी बिंदुओं का पालन करने से ही दस दिवसीय गणेशोत्सव का पूर्ण आध्यात्मिक फल प्राप्त होता है।
यदि आप भी इस पावन अवसर पर अपने घर या व्यावसायिक प्रतिष्ठान में विघ्नहर्ता की स्थापना करने जा रहे हैं, तो यह विस्तृत संकलन आपको पूजन सामग्री से लेकर विसर्जन तक के हर शास्त्रीय नियम की प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध कराएगा।
मुख्य बिंदु (Key Highlights)
स्थापना की पावन तिथि: 14 सितंबर को भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी पर गणपति बप्पा की प्रतिमा की विधिवत प्राण-प्रतिष्ठा होगी।
मध्याह्न शुभ मुहूर्त: भगवान गणेश की पूजा का श्रेष्ठ समय दोपहर 11:08 बजे से दोपहर 01:34 बजे तक रहेगा (कुल अवधि 2 घंटे 26 मिनट)।
चतुर्थी तिथि का विस्तार: चतुर्थी तिथि 13 सितंबर की रात 08:42 बजे शुरू होकर 14 सितंबर की शाम 06:18 बजे तक प्रभावी रहेगी।
अद्भुत ग्रह संयोग: रवि योग, सर्वार्थ सिद्धि योग और स्वाति नक्षत्र के मेल से इस बार की चतुर्थी आर्थिक निवेश, नया व्यापार और गृह प्रवेश के लिए महाफलदायी बनी है।
चंद्र दर्शन निषेध: 14 सितंबर को सुबह 09:12 बजे से रात 08:48 बजे तक चंद्रमा के दर्शन वर्जित रहेंगे; ऐसा करने से ‘मिथ्या कलंक’ (झूठे आरोप) लगने का दोष माना जाता है।
इको-फ्रेंडली प्रतिमा का आग्रह: केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और पर्यावरण संरक्षण संस्थाओं ने केवल मिट्टी (शाडू माटी) से बनी विसर्जन-अनुकूल मूर्तियों के उपयोग की अपील की है।
अनंत चतुर्दशी विसर्जन: दस दिवसीय इस महापर्व का समापन 23 सितंबर को अनंत चतुर्दशी के दिन बप्पा के विसर्जन के साथ संपन्न होगा।

ताजा अपडेट: पंचांग गणना और पंचांगीय तिथियों का गणित
काशी और उज्जैन के ख्यात पंचांगकारों के अनुसार, इस वर्ष भाद्रपद शुक्ल पक्ष की उदयाकालीन चतुर्थी 14 सितंबर को प्राप्त हो रही है। शास्त्रों का स्पष्ट निर्देश है कि जिस दिन मध्याह्न काल (दिन का दूसरा प्रहर) में चतुर्थी तिथि व्याप्त हो, उसी दिन गणेश चतुर्थी का व्रत और स्थापना की जाती है।
13 सितंबर की रात 08:42 बजे चतुर्थी तिथि प्रवेश कर रही है, लेकिन उदया तिथि और दोपहर की व्याप्ति 14 सितंबर को मिलने के कारण समस्त देश में इसी दिन गणेश जन्मोत्सव का पर्व मनाया जाएगा। शाम 06:18 बजे पंचमी तिथि लग जाएगी, किंतु दोपहर में स्थापना हो जाने के बाद पूरे दिन उत्सव का उल्लास रहेगा।
बैकग्राउंड स्टोरी: भाद्रपद चतुर्थी को क्यों हुआ था लंबोदर का प्राकट्य?
शिव महापुराण और गणेश पुराण की कथा के अनुसार, माता पार्वती ने अपने शरीर के उबटन से एक बालक की सुंदर आकृति बनाकर उसमें प्राण फूंक दिए थे। उन्होंने उस बालक को अपने महल के द्वार पर पहरा देने और किसी को भी भीतर न आने देने का आदेश दिया।
जब देवाधिदेव महादेव वहां पहुंचे, तो बालक ने उन्हें भीतर जाने से रोक दिया। शिवजी के गणों और बालक के बीच युद्ध हुआ, लेकिन कोई भी बालक को परास्त न कर सका। अंततः भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से बालक का मस्तक धड़ से अलग कर दिया। माता पार्वती को जब यह ज्ञात हुआ, तो वे अत्यंत कुपित हो उठीं और सृष्टि में प्रलय की स्थिति बन गई।
सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव ने उत्तर दिशा की ओर सिर करके सो रहे एक गज (हाथी) के शिशु का मस्तक लाने का आदेश दिया। गजमुख को बालक के धड़ से जोड़कर महादेव ने उसे नया जीवन दिया और वरदान दिया कि तीनों लोकों में किसी भी मांगलिक कार्य से पूर्व इस बालक की पूजा प्रथम होगी। वह पावन दिन भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी का था, और तभी से यह तिथि ‘विनायक चतुर्थी’ के नाम से पूजित हुई।
रोचक तथ्य: लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने वर्ष 1893 में महाराष्ट्र के पुणे से सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत की थी। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ भारतीयों को संगठित करने, सामाजिक समरसता लाने और राष्ट्रीय चेतना जगाने के लिए एक घरेलू पूजा को विशाल सामाजिक आंदोलन का रूप दिया था।
क्या हुआ खास? 2026 में बने दुर्लभ ग्रह-नक्षत्रों के महायोग
ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार, इस वर्ष गणेश चतुर्थी पर ग्रहों की स्थिति असाधारण रूप से शुभकारी बन रही है:
सर्वार्थ सिद्धि व रवि योग: 14 सितंबर को दोपहर के समय सर्वार्थ सिद्धि योग और रवि योग का एक साथ सक्रिय रहना यह सुनिश्चित करता है कि इस दौरान शुरू किया गया कोई भी नया उपक्रम, नया अनुबंध, भूमि-भवन की रजिस्ट्री या स्वर्ण आभूषण की खरीदारी अक्षय फल प्रदान करेगी।
बुधादित्य राजयोग: सूर्य और बुध की युति सिंह राशि में होने से बुधादित्य योग का निर्माण हो रहा है, जो विद्यार्थियों, लेखकों, सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल्स और शोधकर्ताओं की बुद्धि व निर्णय क्षमता में तेजी लाएगा।
गुरु-चंद्र का गजकेसरी योग: पंचांगीय चक्र में चंद्रमा और देवगुरु बृहस्पति का शुभ दृष्टि संबंध गजकेसरी योग का सृजन कर रहा है, जो समाज में धार्मिक सद्भाव और व्यापारिक उन्नति को विस्तार देगा।
विशेषज्ञ मत: काशी विद्वत परिषद के वरिष्ठ धर्माचार्यों का मानना है कि जब गणेश चतुर्थी पर स्वाति नक्षत्र और रवि योग का मिलन होता है, तो यह ‘विघ्नविनाशक योग’ कहलाता है। इस दिन मिट्टी के गणेशजी की स्थापना कर जो परिवार नियमित 21 दूर्वा और मोदक का भोग लगाता है, उसके पितृदोष और वास्तुदोष स्वतः शांत हो जाते हैं।
गणेश चतुर्थी 2026: मूर्ति स्थापना और पूजा का श्रेष्ठ मुहूर्त
पूजन की शुद्धता के लिए मुहूर्त का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है। नीचे दी गई तालिका में प्रमुख समय-सीमाएं स्पष्ट की गई हैं:
| विवरण / धार्मिक चरण | निर्धारित तिथि | समय-सीमा (घंटे व मिनट) | महत्व एवं निर्देश |
| चतुर्थी तिथि प्रारंभ | 13 सितंबर 2026 | रात 08:42 बजे | व्रत का संकल्प मन में धारण करें |
| चतुर्थी तिथि समाप्त | 14 सितंबर 2026 | शाम 06:18 बजे | इसके बाद पंचमी तिथि का प्रवेश |
| मध्याह्न गणेश पूजा मुहूर्त | 14 सितंबर 2026 | सुबह 11:08 से दोपहर 01:34 तक | प्रतिमा स्थापना व षोडशोपचार पूजा का सर्वश्रेष्ठ समय |
| अभिजीत मुहूर्त | 14 सितंबर 2026 | दोपहर 11:51 से 12:41 तक | किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत के लिए उत्तम |
| चंद्र दर्शन निषेध समय | 14 सितंबर 2026 | सुबह 09:12 से रात 08:48 तक | इस अवधि में आकाश में चंद्रमा को न देखें |
| गणेश विसर्जन (अनंत चतुर्दशी) | 23 सितंबर 2026 | प्रातः काल से संध्या काल तक | दस दिवसीय अनुष्ठान की विधिवत पूर्णता |
पूजन सामग्री की संपूर्ण सूची (Puja Samagri Checklist)
पूजा प्रारंभ करने से पूर्व सभी आवश्यक सामग्री एकत्र कर लें ताकि विधान के बीच व्यवधान न आए:
प्रतिमा: मिट्टी की बनी गणेशजी की सुंदर प्रतिमा (जिसमें सूंड बाईं ओर मुड़ी हो)।
आसन व चौकी: लकड़ी की नई चौकी, लाल या पीला सूती/रेशमी वस्त्र।
कलश व सामग्री: तांबे या पीतल का कलश, नारियल (जटा वाला), आम या अशोक के 5 पत्ते, कलावा (मौली), गंगाजल।
पंचामृत: कच्चा गाय का दूध, दही, देसी घी, शहद और गंगाजल/शक्कर।
सुगंध व पुष्प: लाल चंदन, रोली, हल्दी, अबीर, गुलाल, सिंदूर, इत्र की शीशी, ताजे लाल गुड़हल के फूल और गेंदे की माला।
भोग व प्रसाद: कम से कम 21 ताजी हरी दूर्वा (तीन या पांच गांठ वाली), 21 बेसन या बूंदी के लड्डू/मोदक, 5 प्रकार के मौसमी फल, जनेऊ का जोड़ा, साबुत सुपारी, लौंग, इलायची और पान के पत्ते।
आरती सामग्री: गाय के घी का दीपक, धूपबत्ती, कपूर और घंटी।
संपूर्ण गणेश चतुर्थी 2026 पूजा विधि: चरण-दर-चरण मार्गदर्शिका
वैदिक रीति से पूजा संपन्न करने के लिए इन शास्त्रीय चरणों का अनुक्रम से पालन करें:
1. शुद्धिकरण एवं संकल्प
स्नान आदि से निवृत्त होकर पीले या लाल स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। दाहिने हाथ में जल, अक्षत, सिक्का और फूल लेकर संकल्प लें:
“हे परमपिता परमेश्वर, मैं (अपना नाम बोलें), गोत्र (अपने गोत्र का नाम लें), अपने परिवार के समस्त संकटों के निवारण, सुख-समृद्धि और दीर्घायु की कामना से आज भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को भगवान श्रीगणेश की विधिवत स्थापना व पूजन कर रहा/रही हूं।” संकल्प का जल जमीन पर छोड़ दें।
2. चौकी व कलश स्थापना
लकड़ी की चौकी पर गंगाजल छिड़ककर उसे शुद्ध करें और उस पर लाल वस्त्र बिछाएं। चौकी के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में थोड़ा अक्षत रखकर तांबे का कलश स्थापित करें। कलश में जल, सुपारी, सिक्का और दूर्वा डालें। कलश के मुख पर आम के पत्ते रखें और उसके ऊपर नारियल को कलावा लपेटकर स्थापित करें।
3. प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा
चौकी के मध्य में अक्षत की ढेरी बनाएं और उस पर बप्पा की प्रतिमा को आदरपूर्वक विराजमान करें। यदि प्रतिमा नई है, तो मंत्रोच्चार अथवा “ॐ गं गणपतये नमः” का 11 बार जप करते हुए दूर्वा से प्रतिमा पर गंगाजल छिड़कें और उनकी प्राण-प्रतिष्ठा करें।
4. षोडशोपचार अर्चन
स्नान व वस्त्र: प्रतीकात्मक रूप से जल और पंचामृत के छींटे दें। इसके बाद बप्पा को जनेऊ और कलावा रूपी वस्त्र अर्पित करें।
तिलक व सिंदूर: ललाट पर रोली, चंदन और शुद्ध सिंदूर का तिलक लगाएं।
दूर्वा अर्पण (अति महत्वपूर्ण): 21 दूर्वा की गांठों को जल से धोकर, उन पर थोड़ा गंगाजल छिड़कें और “ॐ गं गणपतये नमः” बोलते हुए भगवान के चरणों और उदर पर अर्पित करें। याद रखें, दूर्वा कभी भी भगवान के मस्तक पर न फेंके, श्रद्धा से चरणों में रखें।
पुष्प व सुगंध: लाल गुड़हल का फूल और गेंदे की माला पहनाएं। इत्र लगाएं।
5. नैवेद्य एवं आरती
भगवान को मोदक, लड्डू और मौसमी फलों का भोग लगाएं। पान के पत्ते पर दो लौंग, एक इलायची और सुपारी रखकर तांबूल अर्पित करें। इसके बाद पूरे परिवार के साथ खड़े होकर धूप-दीप जलाएं और पारंपरिक आरती गाएं: “जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा, माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा…” आरती के उपरांत कपूर जलाकर पुष्पांजलि अर्पित करें और जाने-अनजाने हुई त्रुटियों के लिए क्षमा प्रार्थना करें।
महत्वपूर्ण नोट (Important Note): भगवान गणेश की पूजा में तुलसी दल (तुलसी के पत्ते) का प्रयोग पूर्णतः वर्जित माना गया है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, गणेशजी ने तुलसी जी के विवाह प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था, जिसके बाद तुलसी जी ने उन्हें शाप दिया और गणेशजी ने तुलसी को अपनी पूजा से बहिष्कृत कर दिया।
भूलकर भी न करें चंद्र दर्शन: मिथ्या कलंक से बचने का नियम
गणेश चतुर्थी के दिन चंद्रमा को देखना शास्त्र सम्मत नहीं माना गया है। श्रीमद्भागवत और भविष्य पुराण में वर्णित स्यमंतक मणि की कथा के अनुसार, स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने भाद्रपद चतुर्थी के दिन जल में चंद्रमा का प्रतिबिंब देख लिया था, जिसके कारण उन पर स्यमंतक मणि चुराने का झूठा कलंक लगा था। बाद में उन्होंने गणेश चतुर्थी का व्रत और अनुष्ठान कर इस दोष से मुक्ति पाई थी।
दर्शन का वर्जित समय: 14 सितंबर को प्रातः 09:12 बजे से लेकर रात्रि 08:48 बजे तक आकाश में चंद्रमा की ओर दृष्टि न डालें।
यदि भूल से दर्शन हो जाए तो क्या करें?: यदि अनजाने में चंद्रमा पर नजर पड़ जाए, तो तुरंत अपनी दृष्टि नीचे करें और हाथ में थोड़ा जल व अक्षत लेकर इस वैदिक श्लोक का 28 या 108 बार पाठ करें:
“सिंहः प्रसेनमवधीत्सिंहो जाम्बवता हतः। सुसुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः॥”
इसके अतिरिक्त, किसी पवित्र ब्राह्मण या असहाय व्यक्ति को फल और मिष्ठान्न का दान करने से चंद्र दर्शन के दोष का निवारण हो जाता है।
विद्यार्थियों, युवाओं और नागरिकों पर पर्व का प्रभाव
गणपति उत्सव केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक जीवन को नई ऊर्जा और संस्कार देने वाला पर्व है:
विद्यार्थियों के लिए एकाग्रता का साधन: भगवान गणेश बुद्धि, विवेक और स्मृति के अधिष्ठाता देव हैं। जो छात्र पढ़ाई में भटकाव महसूस कर रहे हैं या प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटे हैं, उन्हें इन 10 दिनों में नित्य नियम से ‘संकटनाशन गणेश स्तोत्र’ अथवा ‘गणपति अथर्वशीर्ष’ का पाठ करना चाहिए। इससे बौद्धिक क्षमता और मानसिक शांति का विकास होता है।
शहरी अर्थव्यवस्था को बूस्ट: देश भर में मूर्तिकारों, फूल विक्रेताओं, हलवाइयों, सजावट कारीगरों और ध्वनि-प्रकाश ऑपरेटरों के लिए यह पर्व करोड़ों रुपये का व्यापार लेकर आता है। छोटे कारीगरों की सालभर की आजीविका इसी उत्सव पर निर्भर करती है।
पर्यावरण चेतना और नागरिक जिम्मेदारी: हाल के वर्षों में प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) और रासायनिक रंगों की मूर्तियों से नदियों और सरोवरों को होने वाले नुकसान के प्रति जागरूकता बढ़ी है। नागरिक अब अपने घरों में शाडू माटी के गणेश स्थापित कर रहे हैं और गमले या बाल्टी में विसर्जन कर उसमें तुलसी का पौधा रोप रहे हैं।
रीडर अलर्ट (Reader Alert): बाजार से प्रतिमा खरीदते समय यह सुनिश्चित करें कि मूर्ति पूरी तरह मिट्टी से निर्मित हो और उसमें प्राकृतिक रंगों का प्रयोग किया गया हो। पीओपी से बनी मूर्तियां जल में नहीं गलतीं और जलीय जीवों के लिए गंभीर संकट पैदा करती हैं।
भविष्य का प्रभाव: गणेशोत्सव से मिलने वाली सामाजिक सीख
दस दिनों तक चलने वाला यह उत्सव व्यक्ति और समाज को अनुशासन, धैर्य और संगठन की शिक्षा देता है:
सामूहिकता की भावना: मोहल्लों और कॉलोनियों में एक साथ पंडाल सजाने से आपसी मतभेद दूर होते हैं और सामाजिक ताना-बाना मजबूत होता है।
स्वच्छता और व्यवस्था: पंडालों और विसर्जन मार्गों पर सफाई का ध्यान रखना नागरिक चेतना का प्रतीक है। स्थानीय नगर निगमों ने भी जलस्रोतों को सुरक्षित रखने के लिए कृत्रिम तालाबों (Artificial Tanks) की व्यवस्था की है।
संस्कृति का अगली पीढ़ी में हस्तांतरण: बच्चे जब घर में मोदक बनते देखते हैं, आरती में ताली बजाते हैं और बप्पा की कहानियां सुनते हैं, तो वे अपनी सनातन परंपराओं से भावनात्मक रूप से जुड़ते हैं।
साधकों और पाठकों को क्या करना चाहिए? (Actionable Advice)
उत्सव के इन दस दिनों (14 सितंबर से 23 सितंबर) में अपने घर की ऊर्जा को सकारात्मक बनाए रखने के लिए इन बातों पर अमल करें:
सात्विकता का पालन: जितने दिन भी बप्पा आपके घर में विराजमान रहें, घर में प्याज, लहसुन, मांसाहार और मदिरा का प्रवेश पूरी तरह वर्जित रखें। कलह और अपशब्दों से बचें।
नित्य दोनों समय आरती: सुबह और शाम के समय पूरे परिवार के साथ मिलकर आरती करें और घर के मुख्य द्वार पर घी का दीपक प्रज्वलित करें।
भोग का नियम: भगवान को जो भी भोग लगाएं, उसमें तुलसी का पत्ता न डालें। प्रतिदिन ताजे फल, मोदक या गुड़-नारियल का भोग अर्पित करें और उसे प्रसाद रूप में आस-पड़ोस में वितरित करें।
विसर्जन की तैयारी: यदि आपने डेढ़, तीन, पांच, सात या दस दिन के लिए गणपति बैठाए हैं, तो विसर्जन के दिन भी विधिवत उत्तर पूजा (विदाई पूजा) करें और आदरपूर्वक विदा करें।
निष्कर्ष
गणेश चतुर्थी 2026 पूजा विधि का मर्म केवल बाहरी आडंबर या भव्यता में नहीं, बल्कि मन की निर्मलता और भगवान के प्रति अनन्य समर्पण में निहित है। 14 सितंबर को जब शुभ मध्याह्न मुहूर्त में बप्पा हमारे घरों में पधारेंगे, तो वे अपने साथ सुख, शांति और ऋद्धि-सिद्धि का वरदान लेकर आएंगे। स्वाति नक्षत्र और रवि योग का यह दुर्लभ संयोग हम सभी को अपने भीतर के अज्ञान और विकारों को त्यागकर नए संकल्पों के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
मिट्टी के इको-फ्रेंडली बप्पा को अपने घर में स्थान दें, विधि-विधान से उनका आतिथ्य करें और पर्यावरण की रक्षा करते हुए इस महापर्व को आनंद, उल्लास और गरिमा के साथ मनाएं।
मुहूर्त के सूक्ष्म अंतर, स्थानीय चंद्रोदय के समय और पंचांगीय शुद्धि की पुष्टि के लिए अपने स्थानीय पंचांग अथवा कुल पुरोहित से परामर्श अवश्य लें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1: गणेश चतुर्थी 2026 में किस तारीख को मनाई जाएगी?
उत्तर: गणेश चतुर्थी का महापर्व 14 सितंबर को मनाया जाएगा। चतुर्थी तिथि 13 सितंबर की रात 08:42 बजे शुरू होगी और 14 सितंबर की शाम 06:18 बजे तक रहेगी। उदया तिथि और दोपहर की व्याप्ति के कारण 14 सितंबर को ही मूर्ति स्थापना होगी।
Q2: 14 सितंबर को गणेश प्रतिमा स्थापना का सबसे शुभ समय क्या है?
उत्तर: भगवान गणेश की पूजा और स्थापना का सबसे श्रेष्ठ मध्याह्न मुहूर्त 14 सितंबर को पूर्वाह्न 11:08 बजे से लेकर दोपहर 01:34 बजे तक रहेगा। इस 2 घंटे 26 मिनट की अवधि में प्राण-प्रतिष्ठा करना सर्वोत्तम फलदायी माना गया है।
Q3: गणेश चतुर्थी पर चंद्र दर्शन क्यों नहीं करना चाहिए?
उत्तर: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चंद्रमा को देखने से व्यक्ति पर झूठे आरोप या ‘मिथ्या कलंक’ लगने का दोष लगता है। इस दिन चंद्र दर्शन करने से स्वयं भगवान श्रीकृष्ण पर भी स्यमंतक मणि चोरी का कलंक लगा था।
Q4: यदि भूलवश 14 सितंबर को चंद्रमा दिख जाए तो क्या उपाय करें?
उत्तर: यदि अनजाने में चंद्रमा के दर्शन हो जाएं, तो घबराएं नहीं। तुरंत नजरें हटाकर श्रीमद्भागवत में वर्णित स्यमंतक मणि मंत्र (“सिंहः प्रसेनमवधीत्…”) का 28 बार जप करें और किसी जरूरतमंद को फल व मिठाई का दान करें।
Q5: गणेशजी को दूर्वा चढ़ाते समय किस नियम का पालन करना चाहिए?
उत्तर: गणेशजी को हमेशा 21 दूर्वा की गांठें ही चढ़ानी चाहिए। प्रत्येक गांठ में तीन या पांच पत्तियां होनी चाहिए। दूर्वा को साफ जल से धोकर, उस पर थोड़ा गंगाजल छिड़ककर आदरपूर्वक बप्पा के चरणों में समर्पित करना चाहिए।
Q6: क्या गणेशजी की पूजा में तुलसी के पत्ते चढ़ा सकते हैं?
उत्तर: कदापि नहीं। गणेशजी की किसी भी पूजा में तुलसी दल का प्रयोग पूरी तरह वर्जित है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार, गणेशजी और तुलसी जी के बीच हुए पारस्परिक शाप के कारण गणेश पूजन में तुलसी का उपयोग निषेध माना गया है।
Q7: घर में स्थापित करने के लिए गणेशजी की कौन सी सूंड वाली मूर्ति लानी चाहिए?
उत्तर: गृहस्थ आश्रम में रहने वाले परिवारों के लिए बाईं ओर मुड़ी हुई सूंड (वाममुखी गणेश) वाली प्रतिमा स्थापित करना अत्यंत शुभ और सुखकारी माना जाता है। दाईं ओर मुड़ी सूंड (सिद्धिविनायक) वाले बप्पा की पूजा में अत्यधिक कड़े नियमों का पालन करना पड़ता है।
Q8: गणेश विसर्जन (अनंत चतुर्दशी) किस तारीख को होगा?
उत्तर: दस दिवसीय गणेशोत्सव का समापन और बप्पा का विसर्जन 23 सितंबर को अनंत चतुर्दशी के पावन पर्व पर धूमधाम के साथ किया जाएगा।
अस्वीकरण (Disclaimer)
यह लेख सनातन धर्म के प्रामाणिक पंचांगों, निर्णय सिंधु, शिव महापुराण और पारंपरिक ज्योतिषीय मान्यताओं के आधार पर तैयार किया गया है। स्थानीय सूर्योदय, सूर्यास्त और अक्षांशीय स्थिति के अनुसार विभिन्न शहरों में पूजा मुहूर्त और चंद्र दर्शन के समय में कुछ मिनटों का आंशिक अंतर हो सकता है। व्यक्तिगत अनुष्ठान, संकल्प और विसर्जन नियमों के लिए अपने कुल पुरोहित अथवा स्थानीय धर्माचार्य का मार्गदर्शन अवश्य लें।


























