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Home - Weather News - IIT कानपुर का क्लाउड सीडिंग प्रयोग फेल? दिल्ली में करोड़ों रुपए पानी में?

IIT कानपुर का क्लाउड सीडिंग प्रयोग फेल? दिल्ली में करोड़ों रुपए पानी में?

दिल्ली में बारिश लाने की कोशिश नाकाम - IIT कानपुर की तकनीक नहीं दिखा पाई असर, अब उठे सवाल फंडिंग और तैयारी पर, जाने पूरी खबर।

Uday Jeet Singh by Uday Jeet Singh
31/10/2025
in Weather News, National News
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क्लाउड सीडिंग-Bharati Fast News
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IIT कानपुर का क्लाउड सीडिंग प्रयोग फेल? दिल्ली में करोड़ों रुपए पानी में? – Bharati Fast News

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दिल्ली में प्रदूषण-संक्रमित वायु को नियंत्रित करने के लिए एक अभिनव तकनीक के तहत चलाया गया प्रयास अब विवादों में है। “दिल्ली क्लाउड सीडिंग प्रयोग” के तहत Indian Institute of Technology Kanpur (IIT कानपुर) के नेतृत्व में संयुक्त परीक्षण किए गए, लेकिन हालिया रिपोर्टें बताती हैं कि अपेक्षित बारिश नहीं आई, निवेश बड़े थे और परिणाम सीमित ही रहे। यह प्रयोग न सिर्फ तकनीकी चुनौतियों का सामना कर रहा है बल्कि उस पर सार्वजनिक और वैज्ञानिक दोनों तरह की आलोचनाएँ भी तूल पकड़ती दिख रही हैं।

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  • IIT कानपुर का क्लाउड सीडिंग प्रयोग फेल? दिल्ली में करोड़ों रुपए पानी में? – Bharati Fast News
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    • दिल्ली की प्रदूषण-संकट
    • क्लाउड सीडिंग का विचार
    • परियोजना स्वीकृति व जिम्मेदारी
  • तकनीकी प्रक्रिया – क्लाउड सीडिंग कैसे होती है?
    • प्रक्रिया का मूल
    • दिल्ली-पे सेट-अप
  • प्रयोग-समय, लागत और विवरण
  • परिणाम और सवाल-चिन्ह
    • उपलब्ध रिपोर्ट्स क्या कहती हैं?
    • आलोचनाएँ और चिंताएँ
  • क्या कह सकते हैं—“फेल” कहना उचित है?
  • आगे का मार्ग—क्या किया जा सकता है?
    • 1. वैज्ञानिक रिपोर्टिंग व निगरानी
    • 2. मूल कारणों पर काम
    • 3. लागत-प्रभाव विश्लेषण
    • 4. ग्रामीण व अन्य शहरों पर आधारित अध्ययन
        • निष्कर्ष: “दिल्ली क्लाउड सीडिंग प्रयोग” ने नव-प्रौद्योगिकीय रूप से एक चुनौती स्वीकार की — पर्यावरण-प्रदूषण जैसे जटिल समस्या पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया गया। हालांकि, परिणाम अपेक्षा अनुरूप नहीं रहे और कई सवाल अब भी शेष हैं। Bharati Fast News – तेज़ खबरें, सच्ची खबरें – यही है भारती फास्ट न्यूज़
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इस लेख में हम इस पूरे प्रयोग-परियोजना का पृष्ठभूमि, लागत, तकनीक, परिणाम, चुनौतियाँ, आलोचनाएँ तथा भविष्य-दृष्टि के दृष्टिकोण से विश्लेषित करने जा रहे हैं।

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क्लाउड सीडिंग 1-Bharati Fast News


दिल्ली में बारिश लाने की कोशिश नाकाम – IIT कानपुर की तकनीक नहीं दिखा पाई असर, अब उठे सवाल फंडिंग और तैयारी पर, जाने पूरी खबर।

दिल्ली की प्रदूषण-संकट

हर सर्दी के मौसम में भारत की राजधानी दिल्ली का वायु-प्रदूषण विकराल होता जाता है। अवरुद्ध वायु, औद्योगिक उत्सर्जन, निर्माण-धूल, आसपास के राज्यों में पराली जलने जैसे कारणों से पीएम2.5 व पीएम10 का स्तर बहुत अधिक रहता है। इस स्थिति से नागरिक स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था दोनों प्रभावित होते हैं।

क्लाउड सीडिंग का विचार

“क्लाउड सीडिंग” वह तकनीक है जिसमें बादलों में विशेष तत्व (जैसे चाँदी आयोडाइड, सोडियम क्लोराइड आदि) छोड़े जाते हैं ताकि वे तेजी से संघट्टित हों, बूंदें बनें और बारिश हो सके।
दिल्ली सरकार ने यह विचार इसलिए अपनाया क्योंकि बारिश होने से वायु में मौजूद कणों (PM2.5, PM10) को धोया जा सकता है और वायु-गुणवत्ता में सुधार हो सकता है।

परियोजना स्वीकृति व जिम्मेदारी

दिल्ली सरकार ने मई 2025 में इस प्रयोग के लिए लगभग ₹3.21 करोड़ मंजूर किए थे।
IIT कानपुर को इस प्रयोग के लिए टेक्निकल संचालन व लॉजिस्टिक्स देने का कार्य सौंपा गया था।
प्रारंभ में योजना के अनुसार पाँच अलग-अलग क्लाउड-सीडिंग अभियान करने थे, प्रत्येक लगभग 100 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को कवर करके।


तकनीकी प्रक्रिया – क्लाउड सीडिंग कैसे होती है?

प्रक्रिया का मूल

  • सबसे पहले उपयुक्त बादल-स्थिति अर्थात् क्लाउड्स में पर्याप्त नमी, उपयुक्त ऊँचाई व प्रकार होना चाहिए।
  • फिर विमान या फ्लाइटशिप द्वारा चाँदी आयोडाइड या अन्य सीडिंग एजेंट छोड़े जाते हैं। ये पानी के कणों को संघट्टित करते हैं।
  • बूंदें बनकर बड़ी होती हैं और अंततः बारिश के रूप में गिर सकती हैं।
  • इस प्रकार, वायुमंडल में मौजूद प्रदूषण-कणों का भी असर कम हो सकता है क्योंकि बारिश उन्हें नीचे ले आती है।

दिल्ली-पे सेट-अप

  • IIT कानपुर की विमान तकनीक (संशोधित Cessna आदि) दिल्ली-एनसीआर के बाहरी इलाकों में प्रयोग के लिए तैनात की गई थी।
  • योजना यह थी कि प्रत्येक sortie लगभग 1.5 घंटे चलेगी, 100 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में।
  • दिल्ली-पश्चिमी बाहरी क्षेत्रों (जैसे बवाना, रोहिणी, अलिपुर) आदि में उड़ानों की योजना बनाई गई थी।

प्रयोग-समय, लागत और विवरण

  • प्रयोग को मई 2025 में मंजूरी मिली; प्रारंभ में जुलाई के पहले सप्ताह (4-11 जुलाई) में पहली उड़ान की तैयारी थी।
  • आधिकारिक जानकारी के अनुसार प्रत्येक परीक्षण करीब ₹1.5 करोड़ तक की लागत वाला था।
  • कुल बजट ₹3.21 करोड़ रखा गया था जिसमें विंग सेट-अप, लॉजिस्टिक्स, उपकरण, विमानों की तैयारी आदि शामिल थे।
  • लेकिन मौसम-शर्तों, क्लियरेंस की देरी व बादल-स्थिति के उपयुक्त न होने के कारण प्रयोग कई बार टल गया।

क्लाउड सीडिंग 2-Bharati Fast News


परिणाम और सवाल-चिन्ह

उपलब्ध रिपोर्ट्स क्या कहती हैं?

  • अक्टूबर 2025 के अंत में एक मीडिया रिपोर्ट में कहा गया कि दिल्ली में दो क्लाउड-सीडिंग कार्यालय उड़ानें की गईं, लेकिन “0.1 मिमी” या “0.2 मिमी” से अधिक बारिश दर्ज नहीं हुई।
  • इस रिपोर्ट के मुताबिक, नमी मात्र लगभग 15-20% थी, जो सफल सीडिंग के लिए पर्याप्त नहीं मानी जाती।
  • एक अन्य रिपोर्ट में कहा गया कि परियोजना का “प्रतीकात्मक” लाभ तो हुआ, लेकिन वास्तविक-बारिश नहीं हुई और यह फैसला वैज्ञानिक रूप से “मिश्रित परिणाम” वाला है।

आलोचनाएँ और चिंताएँ

  • वैज्ञानिकों ने कहा कि क्लाउड सीडिंग केवल तभी सफल हो सकती है जब बादल में पर्याप्त नमी हो — दिल्ली में अक्सर शीत-मौसम या बाहरी इलाकों में उपयुक्त क्लाउड्स नहीं मिलते।
  • पारिस्थितिक व स्वास्थ्य-प्रभावों पर भी सवाल उठे हैं — जैसे चाँदी आयोडाइड का निरंतर उपयोग मिट्टी व जल-प्रवाह को प्रभावित कर सकता है।
  • कुछ विशेषज्ञों ने इसे “प्रदूषण का स्रोत न हटाने वाला माप” कहा — अर्थात् कारखानों, वाहन-उत्सर्जन, निर्माण-धूल जैसे मूल कारणों को नहीं छूता।

क्या कह सकते हैं—“फेल” कहना उचित है?

यह कहना कि यह क्लाउड सीडिंग प्रयोग पूरी तरह फेल हुआ है, अभी वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं है। मगर निम्न बातें स्पष्ट हैं:

  • अपेक्षित बारिश नहीं आई, या बेहद सीमित मात्रा में हुई — जिससे वायु-गुणवत्ता पर ठोस सुधार नहीं दिखा।
  • राज्य-नियोजन व विज्ञापन के अनुसार बड़ी उम्मीदें थीं, लेकिन परिणाम अपेक्षा अनुरूप नहीं हुए।
  • निवेश बड़ी राशि का हुआ था (₹3.21 करोड़) और इस प्रकार जनता-वित्तीय जिम्मेदारी बढ़ जाती है।
  • इसलिए “IIT कानपुर का क्लाउड सीडिंग प्रयोग फेल” जैसी टैगलाइन बहुत सावधानी से इस्तेमाल करनी चाहिए — यह कह सकते हैं कि “परिणाम अपेक्षित नहीं हुए” और “प्रभाव सीमित रहे” अभी तक स्पष्ट है।

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आगे का मार्ग—क्या किया जा सकता है?

1. वैज्ञानिक रिपोर्टिंग व निगरानी

प्रक्रिया के बाद प्रभाव-मापन (जैसे वायु-कण स्तर, बारिश-मात्रा, जल-गुणवत्ता) को सार्वजनिक रूप से साझा करना होगा। ताकि यह आकलन हो सके कि क्लाउड सीडिंग ने क्या योगदान दिया।

2. मूल कारणों पर काम

वायु-प्रदूषण को सचमुच नियंत्रित करने के लिए वाहन-उत्सर्जन, निर्माण-धूल, कृषि-पराली जलना आदि को रोकने पर ध्यान देना होगा — क्लाउड सीडिंग सिर्फ अल्पकालीन सहायक उपाय है।

3. लागत-प्रभाव विश्लेषण

यह जाना जाना चाहिए कि हर ₹1 खर्च पर कितना लाभ हुआ? क्या यह खर्च संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग था? भविष्य-प्रोजेक्ट्स में यह निर्णय उपयोगी होगा।

4. ग्रामीण व अन्य शहरों पर आधारित अध्ययन

दिल्ली के बाहरी इलाकों व अन्य राज्यों में अलग-मौसम वाली परिस्थितियाँ होंगी — वहां किस तरह का परिणाम मिलेगा यह अध्ययन-विषय है।


निष्कर्ष: “दिल्ली क्लाउड सीडिंग प्रयोग” ने नव-प्रौद्योगिकीय रूप से एक चुनौती स्वीकार की — पर्यावरण-प्रदूषण जैसे जटिल समस्या पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया गया। हालांकि, परिणाम अपेक्षा अनुरूप नहीं रहे और कई सवाल अब भी शेष हैं।
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आग्रह और आपके अमूल्य सुझाव

हमें आपके विचार जानने में खुशी होगी। कृपया बताएं — क्या आपको लगता है कि क्लाउड सीडिंग जैसी तकनीक पर्यावरण-मुक्ति का सही उपाय है? या हमें अधिक पारदर्शिता, लागत-मापन व मूल कारण-नियंत्रण पर ध्यान देना चाहिए? अगर आप इस लेख को उपयोगी मानते हैं, तो इसे अपने मित्र-परिवार व सोशल मीडिया पर साझा करें और Bharati Fast News को फॉलो करें।


Disclaimer: इस लेख में प्रस्तुत जानकारी सार्वजनिक मीडिया स्रोतों तथा तकनीकी रिपोर्ट्स पर आधारित है। किसी भी सरकारी निर्णय, निवेश या वैज्ञानिक अध्ययन से पहले संबंधित अधिकारियों या विशेषज्ञों से प्रमाण-सूचना अवश्य प्राप्त करें।


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Uday Jeet Singh

Uday Jeet Singh

Uday- Bharati Fast News में लेखक के रूप में कार्यरत हैं। ये टेक्नोलॉजी, मनोरंजन, खेल और सामयिक घटनाओं से संबंधित विषयों पर समाचार लेखन करते हैं।इनका कार्य विश्वसनीय स्रोतों से जानकारी एकत्र करना, तथ्यों का सत्यापन करना और पाठकों तक स्पष्ट एवं सटीक समाचार पहुँचाना है। Uday द्वारा तैयार की गई सामग्री संपादकीय समीक्षा के बाद प्रकाशित की जाती है।भूमिका: Author – Bharati Fast News

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