मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के नियम पर सुप्रीम कोर्ट में मामला, SIR फैसलों पर चुनाव आयोग ने क्या कहा?
नई दिल्ली: मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया और चुनाव आयोग के कामकाज से जुड़े विवाद ने एक बार फिर ध्यान खींचा है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दायर याचिका और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR से संबंधित फैसलों पर चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखा है। आयोग ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि SIR से जुड़े तीनों आदेश सर्वसम्मति से लिए गए थे।
26 अक्टूबर 2026 को सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, चुनाव आयोग ने अपने जवाबी हलफनामे में यह भी कहा कि याचिका मुख्य रूप से एक समाचार रिपोर्ट पर आधारित है। आयोग का कहना है कि फाइलों पर अधिकारियों या चुनाव आयुक्तों की टिप्पणियों को अपने आप में आयोग का अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता। अब इस मामले में कानूनी सवाल यह है कि आयोग के निर्णय लेने की प्रक्रिया कानून के अनुरूप थी या नहीं।
चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में क्या पक्ष रखा?
चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में कहा कि विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR से जुड़े 24 जून 2025, 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026 के आदेश आयोग के सभी सदस्यों की सहमति से जारी किए गए थे। आयोग ने मुख्य चुनाव आयुक्त पर अकेले फैसले लेने के आरोपों से इनकार किया।
आयोग के अनुसार, संबंधित फाइलें निर्णय प्रक्रिया के दौरान दोनों चुनाव आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्त के पास विचार के लिए भेजी जाती हैं। आयोग ने यह भी कहा कि फाइल पर दर्ज सुझाव, सवाल, टिप्पणियां या आपत्तियां अपने आप में अंतिम निर्णय नहीं होतीं। उसके मुताबिक, आयोग का निर्णय निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार अनुमोदित और दर्ज किए जाने के बाद लागू किया जाता है।
आयोग ने यह भी दलील दी कि याचिका में लगाए गए आरोप एक समाचार रिपोर्ट पर आधारित हैं और याचिकाकर्ता ने आयोग से तथ्यों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की। यह आयोग का अपना पक्ष है; आरोपों और जवाब के कानूनी प्रभाव पर अंतिम निर्णय अदालत को करना है।
SIR और Form 6 को लेकर क्या विवाद है?
SIR का पूरा नाम Special Intensive Revision है। इसके तहत मतदाता सूची की विशेष गहन जांच और पुनरीक्षण किया जाता है। इस प्रक्रिया में मतदाताओं की पात्रता, दस्तावेजों और पुराने मतदाता रिकॉर्ड से संबंधित सवाल उठ सकते हैं।
विवाद के एक हिस्से में Form 6 और उसके साथ इस्तेमाल होने वाले घोषणा-पत्र को लेकर सवाल उठाए गए। Form 6 का इस्तेमाल नए मतदाता के रूप में नाम शामिल कराने के लिए किया जाता है। चुनाव आयोग ने अपने जवाब में कहा कि SIR प्रक्रिया के दौरान इस्तेमाल किया गया घोषणा-पत्र वैधानिक Form 6 से अलग दस्तावेज है और आयोग ने Form 6 में बदलाव नहीं किया।
इस मुद्दे पर पहले सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर हुई थीं। अदालत ने अक्टूबर की शुरुआत में संबंधित पक्षों से जवाब मांगा था और कहा था कि कानून के अनुरूप न पाए जाने वाले फैसलों की जांच की जा सकती है। हालांकि, जवाबी हलफनामा दाखिल होना अपने आप में आरोपों की पुष्टि या मामले के अंतिम निपटारे का संकेत नहीं है।
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया क्या है?
भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) को पद से हटाने की प्रक्रिया सामान्य सरकारी पदों से अलग है। संविधान के अनुच्छेद 324(5) के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिन आधारों और प्रक्रिया के तहत सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाया जाता है।
इस संवैधानिक सुरक्षा का उद्देश्य चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को बनाए रखना है, ताकि चुनाव से जुड़े निर्णय लेने वाली संस्था पर अनुचित राजनीतिक दबाव न पड़े। केवल आरोप लगने या किसी फैसले से असहमति होने भर से मुख्य चुनाव आयुक्त को स्वतः पद से नहीं हटाया जा सकता।
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए किन आधारों की जरूरत होती है?
संविधान के अनुच्छेद 124(4) में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने के लिए जिन आधारों का उल्लेख है, उसी तरह मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए भी सिद्ध कदाचार (proved misbehaviour) या अक्षमता (incapacity) का आधार आवश्यक है।
- सिद्ध कदाचार: ऐसे गंभीर आचरण या कृत्य, जिन्हें निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया में प्रमाणित किया जाए।
- अक्षमता: पद की जिम्मेदारियां निभाने में ऐसी अक्षमता, जो निर्धारित प्रक्रिया के तहत स्थापित हो।
इन आधारों पर हटाने की कार्रवाई के लिए संवैधानिक और संसदीय प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है। आरोप लगाए जाने मात्र से आरोप सिद्ध नहीं माने





























