Himalayan Glaciers: तेजी से पिघल रहा हिमालय, भारत की 20% GDP पर खतरा! नेपाल त्रासदी ने बढ़ाई चिंता
सफेद बर्फ की चादर ओढ़े खड़े हिमालयी पर्वतमाला के भीतर प्रकृति एक ऐसा मौन और खतरनाक संकट तैयार कर रही है, जिसकी गूंज पूरे दक्षिण एशिया की अर्थव्यवस्था को हिलाने के लिए काफी है। नेपाल और तिब्बत सीमा पर हाल ही में ग्लेशियर टूटने और मलबे के बहाव से आई प्रलयंकारी बाढ़ में सैकड़ों जिंदगियों के लील जाने की भयावह तस्वीर अभी धुंधली भी नहीं पड़ी थी कि वैश्विक पर्यावरण शोधकर्ताओं ने एक और सनसनीखेज चेतावनी जारी कर दी है।
वैश्विक थिंक-टैंक ‘सिस्टेमिक’ (Systemiq), ‘इंटीग्रेटेड माउंटेन इनिशिएटिव’ (IMI) और अंतरराष्ट्रीय पर्वतीय विकास केंद्र (ICIMOD) द्वारा संयुक्त रूप से जारी ताज़ा रिपोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि हिमालय ग्लेशियर पिघलना पिछले एक दशक के मुकाबले 65 फीसदी अधिक तेज हो चुका है। यह केवल पर्यावरण का नुकसान नहीं है, बल्कि भारत की लगभग 20 प्रतिशत सकल घरेलू उत्पाद (GDP), यानी देश की जीवनरेखा मानी जाने वाली अर्थव्यवस्था, सीधे तौर पर दांव पर लग चुकी है। सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र के मैदानी इलाकों में अन्न उगाने वाले किसानों से लेकर पूर्वोत्तर के पनबिजली संयंत्रों और धार्मिक पर्यटन तक, यह जल संकट देश की रीढ़ को झकझोरने की कगार पर पहुंच गया है।
मुख्य बिंदु (Key Highlights)
पिघलने की रफ्तार में 65% का उछाल: पिछले दस वर्षों की तुलना में हिमालयी हिमनदों के बर्फ द्रव्यमान के क्षरण की दर 65 प्रतिशत तेज हो चुकी है।
भारत की 20% GDP पर सीधा खतरा: गंगा, यमुना, सिंधु और ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन पर आधारित भारत की कृषि, पनबिजली, चाय उद्योग और तीर्थाटन अर्थव्यवस्था देश की 20% जीडीपी को सहारा देती है, जो ग्लेशियरों के सूखने से प्रभावित होगी।
निगरानी का गंभीर संकट: हिंदू कुश हिमालय और काराकोरम रेंज के 40,000 से अधिक ग्लेशियरों में से मात्र 21 ग्लेशियरों की ही जमीनी स्तर पर निरंतर निगरानी की जा रही है।
56 हिमनद झीलें ‘अति-संवेदनशील’ श्रेणी में: भारत सरकार के सर्वेक्षण के अनुसार देश के हिमालयी क्षेत्र में 189 संवेदनशील झीलों में से 56 ग्लेशियल लेक्स बेहद खतरनाक (Very High Risk) स्थिति में पहुंच चुकी हैं।
2050 तक ‘पीक वॉटर’ का अल्टीमेटम: वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस सदी के मध्य तक नदियां अपने अधिकतम प्रवाह यानी ‘पीक वॉटर’ तक पहुंच जाएंगी, जिसके बाद स्थायी जल संकट और जलप्रवाह में गिरावट शुरू होगी।
मैदानी इलाकों का ब्लैक कार्बन प्रदूषण: हिमालयी बर्फ के तेजी से पिघलने के पीछे लगभग एक-तिहाई वजह ईंट-भट्ठों, वाहनों और पराली से उठने वाला ब्लैक कार्बन (कालिख) है, जो बर्फ पर जम कर गर्मी सोख रहा है।
नेपाल त्रासदी एक बड़ा अलार्म: अगस्त 2026 में नेपाल-तिब्बत सीमा पर ग्लेशियर धंसने के दो घंटे के भीतर आई बहु-स्तरीय आपदा ने दिखा दिया है कि एक छोटी सी भौगोलिक घटना कैसे अंतरराष्ट्रीय त्रासदी बन सकती है।
ताजा अपडेट: नई रिपोर्ट के आंकड़े और चेतावनी (Latest Update)
रॉकफेलर फाउंडेशन के सहयोग से तैयार की गई इस आपातकालीन वैज्ञानिक रिपोर्ट ने भारत सरकार और नीति आयोग के गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। रिपोर्ट के अनुसार, हिमालय का पर्यावरण अब अपने ‘टिपिंग पॉइंट’ (Tipping Point) यानी उस सीमा पर पहुंच रहा है जहां से प्राकृतिक नुकसान की भरपाई करना असंभव हो जाएगा।
रिपोर्ट के प्रमुख अंशों को रेखांकित करते हुए लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के ग्रंथम रिसर्च इंस्टीट्यूट के प्रमुख अर्थशास्त्री लॉर्ड निकोलस स्टर्न ने कहा कि हिमालय कोई साधारण पर्वतमाला नहीं बल्कि दक्षिण एशिया का “थर्ड पोल” (तीसरा ध्रुव) और राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय आर्थिक बुनियादी ढांचा है। यदि यह बुनियादी ढांचा ढहता है, तो करोड़ों लोगों की आजीविका ताश के पत्तों की तरह बिखर जाएगी।
पृष्ठभूमि: ‘एशिया का वाटर टावर’ क्यों सूख रहा है? (Background Story)
पश्चिम में अफगानिस्तान से लेकर पूर्व में म्यांमार तक 3,500 किलोमीटर में फैली हिंदू कुश हिमालय श्रृंखला को ‘एशिया का वाटर टावर’ कहा जाता है। यह प्राकृतिक भंडार भारत, नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन समेत आठ देशों के 2 अरब से अधिक लोगों को पीने का पानी, सिंचाई और ऊर्जा प्रदान करता है।
सदी की शुरुआत के बाद से इस विशाल हिम भंडार के घटने की गति दोगुनी हो चुकी है। 1990 से 2020 के बीच हिमालय ने अपने कुल ग्लेशियर क्षेत्र का लगभग 12 प्रतिशत हिस्सा हमेशा के लिए खो दिया है। गंगा बेसिन के हिमनदों में 21 प्रतिशत, ब्रह्मपुत्र बेसिन में 16 प्रतिशत और सिंधु बेसिन में 6 प्रतिशत का भारी संकुचन दर्ज किया गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि तापमान में मामूली वृद्धि भी ऊंचाई पर मौजूद पर्माफ्रॉस्ट (जमी हुई मिट्टी और चट्टानें) को पिघला रही है, जिससे पहाड़ों की ढलानें अस्थिर हो रही हैं।
[Reader Alert]
जब ग्लेशियर पीछे हटते हैं, तो वे अपने पीछे कमजोर मिट्टी और पत्थरों से घिरी विशाल झीलें छोड़ जाते हैं। बादल फटने या चट्टान गिरने पर ये झीलें अचानक फट जाती हैं, जिसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) कहा जाता है।
नेपाल में क्या हुआ? चार आपदाओं का एक साथ तांडव (What Happened?)
हाल ही में नेपाल-तिब्बत सीमा पर घटी त्रासदी ने इस बात का ज्वलंत प्रमाण दिया है कि हिमालय में स्थितियां कितनी अप्रत्याशित हो चुकी हैं। 26 अगस्त को एक ग्लेशियर का विशाल हिस्सा अचानक भरभराकर नीचे गिरा।
इस घटना ने एक भयानक ‘कैस्केडिंग डिजास्टर’ (एक के बाद एक होने वाली आपदा) को जन्म दिया:
सबसे पहले विशाल हिमस्खलन और भूस्खलन हुआ।
मलबे ने एक संकरी नदी की घाटी को रोककर अस्थायी बांध बना दिया।
कुछ ही मिनटों में पानी के भारी दबाव से वह कच्चा बांध टूट गया।
अचानक आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड ने नीचे बसे कस्बों, पुलों और बिजली परियोजनाओं को कुछ ही घंटों में तबाह कर दिया, जिसका मलबा भारत के सीमावर्ती इलाकों तक बहकर आया।
इस घटना में 1,300 से अधिक लोगों की जान चली गई और 5,300 से ज्यादा लोग लापता दर्ज किए गए। विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल शुरुआत है; यदि समय रहते निगरानी तंत्र नहीं सुधरा, तो भारत के उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, लद्दाख और सिक्किम में भी ऐसे ही विनाशकारी परिदृश्य देखने को मिल सकते हैं।
आर्थिक और भू-पर्यावरणीय विश्लेषण: 20% GDP खतरे में क्यों? (Expert Analysis)
यह धारणा पूरी तरह गलत है कि पहाड़ों का संकट केवल पहाड़ी राज्यों तक सीमित रहता है। नई रिपोर्ट में आर्थिक आंकड़ों का जो खुलासा हुआ है, वह नीति निर्धारकों की आंखें खोलने वाला है:
1. सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र के मैदानी इलाकों की कृषि
उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, बिहार और पश्चिम बंगाल का कृषि तंत्र हिमालयी नदियों के पानी और उससे पोषित भूजल पर निर्भर करता है। यदि ग्लेशियरों का प्रवाह असंतुलित होता है, तो देश के अन्न भंडार—चावल और गेहूं की पैदावार—में भारी गिरावट आएगी।
2. असम और पश्चिम बंगाल का चाय उद्योग
असम और दार्जिलिंग के विश्वप्रसिद्ध चाय बागानों की आर्द्रता और जल प्रबंधन सीधे तौर पर हिमालयी जल प्रणाली और मौसमी संतुलन से जुड़े हैं। जल चक्र के बिगड़ने से चाय निर्यात और लाखों मजदूरों का रोजगार प्रभावित होगा।
3. पनबिजली (Hydro-power) का संकट
भारत के पूर्वोत्तर और उत्तरी राज्यों में स्थापित दर्जनों हाइड्रो-इलेक्ट्रिक पावर प्रोजेक्ट्स ग्लेशियर के स्थिर जलप्रवाह पर आधारित हैं। ग्लेशियरों के पिघलने से आने वाला गाद (Silt) टर्बाइनों को नष्ट करता है, और भविष्य में पानी घटने से देश में बिजली उत्पादन ठप होने का खतरा मंडराएगा।
4. तीर्थाटन और पर्यटन अर्थव्यवस्था
चारधाम यात्रा (बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री), अमरनाथ यात्रा और हेमकुंड साहिब जैसी धार्मिक यात्राएं उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। बार-बार आने वाली प्राकृतिक आपदाएं इस बहु-अरब डॉलर की तीर्थाटन अर्थव्यवस्था को पंगु बना रही हैं।
[Expert View]
"हिमालय भारत के भौगोलिक क्षेत्रफल का केवल 18% है, लेकिन देश की कुल प्राकृतिक आपदाओं का 35% हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हिमालयी जल प्रणाली देश की 20% जीडीपी बनाती है, लेकिन इन पर्वतीय राज्यों को उस आर्थिक मूल्य का मात्र 5% हिस्सा ही मिल पाता है।"
— डॉ. पेमा ग्याम्त्शो, महानिदेशक, ICIMOD
प्रदूषण का छिपा हुआ खलनायक: ब्लैक कार्बन (Interesting Fact & Science)
ग्लेशियरों के पिघलने के लिए केवल वैश्विक ग्रीनहाउस गैसें ही जिम्मेदार नहीं हैं। रिपोर्ट में एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है—हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने की लगभग एक-तिहाई (33%) वजह मैदानी इलाकों से उड़कर आने वाला ‘ब्लैक कार्बन’ है।
भारत और पाकिस्तान के मैदानी इलाकों में चलने वाले पारंपरिक ईंट-भट्ठे, पुराने डीजल वाहन, पराली का धुआं और बायोमास जलने से निकलने वाली कालिख हवा के साथ उड़कर हिमालय की चोटियों पर बैठ जाती है।
सफेद बर्फ सूरज की किरणों को 80-90% तक अंतरिक्ष में वापस परावर्तित (Reflect) कर देती है, जिसे एल्बिडो इफेक्ट (Albedo Effect) कहा जाता है।
जब काली कालिख बर्फ की सतह पर जम जाती है, तो बर्फ धूप को सोखने लगती है और पिघलने की दर कई गुना तेज हो जाती है।
अच्छी बात यह है कि वैश्विक तापमान की तुलना में ब्लैक कार्बन स्थानीय समस्या है, जिसे ईंट-भट्ठों को आधुनिक जिग-जैग तकनीक पर शिफ्ट करके और स्वच्छ ईंधन अपनाकर तुरंत नियंत्रित किया जा सकता है।
[Interesting Fact]
हिंदू कुश-हिमालय क्षेत्र में लगभग 40,000 ग्लेशियर मौजूद हैं, लेकिन वैज्ञानिक रूप से लगातार केवल 21 ग्लेशियरों पर ही सेंसर लगाकर वास्तविक समय में निगरानी की जा रही है। बाकी 99.9% क्षेत्र वैज्ञानिक दृष्टि से आज भी एक 'ब्लैक बॉक्स' बना हुआ है।
हिमालयी आपदाओं और ग्लेशियर संकट की महत्वपूर्ण समयरेखा (Important Dates Table)
| वर्ष / समय | महत्वपूर्ण घटना / रिपोर्ट | मुख्य परिणाम और प्रभाव |
| जून 2013 | केदारनाथ त्रासदी (उत्तराखंड) | चोराबाड़ी ग्लेशियर झील टूटने से प्रलयंकारी बाढ़, 5,000 से अधिक मौतें। |
| फरवरी 2021 | चमोली नंदा देवी ग्लेशियर हादसा | रोंटी ग्लेशियर का हिस्सा टूटने से ऋषिगंगा और तपोवन बिजली परियोजनाएं ध्वस्त, 200+ हताहत। |
| अक्टूबर 2023 | दक्षिण ल्होनक झील विस्फोट (सिक्किम) | तीस्ता-III बांध टूटा, सेना के जवानों समेत 70 से ज्यादा मौतें, भारी आर्थिक तबाही। |
| जुलाई 2025 | संसद में वैज्ञानिक रिपोर्ट की पुष्टि | भारत की 56 ग्लेशियल झीलों को ‘अति-उच्च जोखिम’ (Very High Risk) घोषित किया गया। |
| अगस्त 2026 | नेपाल-तिब्बत सीमांत ग्लेशियर पतन | कैस्केडिंग भूस्खलन और बाढ़ में 1,300 से अधिक मौतें, 5,300 लापता। |
| सितंबर 2026 | सिस्टेमिक व ICIMOD आपातकालीन रिपोर्ट | खुलासा: ग्लेशियर पिघलना 65% तेज हुआ, भारत की 20% GDP पर संकट। |
| 2050 (अनुमानित) | ‘पीक वॉटर’ (Peak Water) की स्थिति | हिमालयी नदियों का पानी चरम पर पहुंचकर स्थायी रूप से घटना शुरू होगा। |
आम नागरिकों, किसानों और छात्रों पर क्या होगा असर? (Student / Citizen Impact)
यह पर्यावरणीय उथल-पुथल देश के हर वर्ग के दैनिक जीवन को सीधे प्रभावित करने वाली है:
किसानों के लिए अनिश्चितता: रबी और खरीफ फसलों के समय नदियों में या तो बाढ़ का पानी खेतों को बहा ले जाएगा या फिर गर्मियों में नहरें सूख जाएंगी। सिंचाई की लागत बढ़ने से खाद्यान्न की कीमतें आसमान छूने लगेंगी।
शहरी आबादी के लिए पेयजल संकट: दिल्ली, हरिद्वार, प्रयागराज, पटना, कोलकाता और गुवाहाटी जैसे विशाल शहरों की जलापूर्ति सीधे हिमालयी जलमार्गों से जुड़ी है। ‘पीक वॉटर’ के बाद शहरों में जल संकट विकराल रूप धारण कर सकता है।
छात्रों और युवा शोधकर्ताओं के लिए अवसर: पर्यावरण विज्ञान (Glaciology), आपदा प्रबंधन, रिमोट सेंसिंग और क्लाइमेट फाइनेंसिंग के क्षेत्र में नए अध्ययनों और नौकरियों की मांग तेजी से बढ़ेगी।
बिजली बिलों में इजाफा: यदि रन-ऑफ-द-रिवर पनबिजली परियोजनाएं गाद और पानी की कमी से प्रभावित होती हैं, तो ग्रिड को थर्मल या महंगी ऊर्जा पर निर्भर होना पड़ेगा, जिसका सीधा असर आम नागरिक के बिजली बिल पर पड़ेगा।
[Important Note]
वैज्ञानिक भाषा में 'पीक वॉटर' (Peak Water) वह स्थिति है जब तेजी से पिघलते ग्लेशियरों के कारण नदियों में पानी की मात्रा अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच जाती है। इसके बाद ग्लेशियर का द्रव्यमान इतना कम हो जाता है कि नदियों में बहने वाले पानी में स्थायी और अपरिवर्तनीय गिरावट शुरू हो जाती है।
भविष्य का परिदृश्य: अगर कदम नहीं उठाए तो आगे क्या होगा? (Future Impact)
जलवायु मॉडल दर्शाते हैं कि यदि वैश्विक उत्सर्जन और स्थानीय प्रदूषण की मौजूदा रफ्तार जारी रही, तो इस सदी के अंत (2100) तक हिंदू कुश हिमालय अपने मौजूदा ग्लेशियर आयतन का 80 प्रतिशत हिस्सा हमेशा के लिए खो सकता है।
सीमा पार जल विवाद: पानी की कमी के चलते भारत, पाकिस्तान, चीन, नेपाल और बांग्लादेश के बीच अंतरराष्ट्रीय नदियों (सिंधु, ब्रह्मपुत्र, कोसी) के जल बंटवारे को लेकर कूटनीतिक और सामरिक तनाव गहराएगा।
जलवायु शरणार्थी (Climate Migrants): हिमालय के ऊंचे गांवों में पानी के स्रोत सूखने से पलायन तेज होगा। लोग तराई और बड़े शहरों की ओर रुख करेंगे, जिससे शहरी बुनियादी ढांचे पर भारी दबाव पड़ेगा।
पारिस्थितिक तंत्र का विनाश: अल्पाइन वनस्पतियां, दुर्लभ औषधीय पौधे, स्नो लेपर्ड और हिमालयी जीवों की अनूठी प्रजातियां आवास नष्ट होने से विलुप्ति की कगार पर पहुंच जाएंगी।
पाठकों, श्रद्धालुओं और पर्यटकों को क्या करना चाहिए? (What Should Readers Do?)
यदि आप हिमालयी क्षेत्रों की यात्रा की योजना बना रहे हैं या पर्यावरण के प्रति सजग नागरिक हैं, तो इन दिशा-निर्देशों का पालन करें:
मौसम और आपदा अलर्ट जांचें: पहाड़ों पर जाने से पहले भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD), राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA) और केंद्रीय जल आयोग (CWC) के आधिकारिक बुलेटिन अवश्य पढ़ें।
सतत और जिम्मेदार पर्यटन अपनाएं: संवेदनशील उच्च-ऊंचाई वाले क्षेत्रों में प्लास्टिक कचरा न फैलाएं और वाहनों के अत्यधिक उपयोग से बचें ताकि स्थानीय कार्बन उत्सर्जन न बढ़े।
स्थानीय चेतावनियों की अनदेखी न करें: यदि किसी नदी घाटी में पानी का रंग अचानक मटमैला हो जाए या जलस्तर असामान्य रूप से तेजी से घटे/बढ़े, तो बिना देर किए तत्काल ऊंचे स्थानों पर चले जाएं।
पारंपरिक जल संरक्षण अपनाएं: मैदानी इलाकों में रहने वाले लोग अपने घरों में रेनवाटर हार्वेस्टिंग और जल संरक्षण के उपाय शुरू करें, ताकि भूमिगत जल पर निर्भरता संतुलित रह सके।
निष्कर्ष (Conclusion)
नेपाल की विनाशकारी बाढ़ और नवीनतम वैज्ञानिक रिपोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि हिमालय ग्लेशियर पिघलना अब भविष्य की चेतावनी नहीं, बल्कि वर्तमान की भयावह वास्तविकता है। हिमालय केवल भौगोलिक सीमा नहीं, बल्कि भारत की खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा और 20 प्रतिशत जीडीपी का अटूट आधार स्तंभ है।
सिर्फ शोक जताने या आपातकालीन राहत शिविर लगाने से यह संकट नहीं टलेगा। अब समय आ गया है कि भारत और पड़ोसी देश मिलकर ग्लेशियरों की रीयल-टाइम सैटेलाइट निगरानी बढ़ाएं, ब्लैक कार्बन उत्सर्जित करने वाले उद्योगों पर कड़े प्रतिबंध लगाएं और हिमालयी विकास के मॉडल को प्रकृति-सम्मत बनाएं। प्रकृति ने खतरे की अंतिम घंटी बजा दी है; यदि हम अब भी नहीं जागे, तो आने वाली पीढ़ियों को केवल प्यास और प्रलय ही विरासत में मिलेगी।
पाठकों को सलाह दी जाती है कि वे किसी भी असत्यापित सूचना पर विश्वास करने के बजाय केवल पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, केंद्रीय जल आयोग (CWC) और प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संस्थानों के आधिकारिक बयानों पर ही ध्यान दें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (Frequently Asked Questions – FAQs)
1. हिमालय ग्लेशियर पिघलना भारत की जीडीपी को कैसे प्रभावित करता है?
हिमालय से निकलने वाली नदियां भारत के विशाल सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र बेसिन को सींचती हैं। इस क्षेत्र की कृषि (गेहूं, धान), असम-बंगाल के चाय बागान, पनबिजली उत्पादन और उत्तर भारत का धार्मिक तीर्थाटन मिलकर देश की 20% से अधिक जीडीपी का निर्माण करते हैं, जो सीधे जल संकट से प्रभावित होंगे।
2. हाल ही में आई नेपाल त्रासदी का मुख्य कारण क्या था?
26 अगस्त 2026 को नेपाल-तिब्बत सीमा पर एक विशाल ग्लेशियर के टूटने से भारी भूस्खलन हुआ। मलबे ने नदी को रोककर कृत्रिम झील बनाई, जिसके फटने से आई भीषण बाढ़ ने भारी तबाही मचाई और 1,300 से अधिक लोगों की जान ले ली।
3. ‘पीक वॉटर’ (Peak Water) क्या है और यह कब आने वाला है?
पीक वॉटर वह बिंदु है जब ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के कारण नदियों में बहाव अपने अधिकतम स्तर पर पहुंच जाता है। ICIMOD वैज्ञानिकों का अनुमान है कि हिमालयी बेसिनों में यह स्थिति लगभग 2050 तक आ जाएगी, जिसके बाद पानी में स्थायी गिरावट होगी।
4. ब्लैक कार्बन ग्लेशियरों को कैसे नुकसान पहुंचाता है?
मैदानी इलाकों के ईंट-भट्ठों, वाहनों और पराली के धुएं से निकलने वाली कालिख उड़कर बर्फ पर जम जाती है। इससे बर्फ का परावर्तन (Albedo) कम हो जाता है और वह सूरज की गर्मी को तेजी से सोखने लगती है, जिससे पिघलाव 33% तक बढ़ जाता है।
5. भारत में कितनी हिमनद झीलें ‘अति-उच्च जोखिम’ श्रेणी में हैं?
संसद में प्रस्तुत आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारतीय हिमालयी क्षेत्र में वैज्ञानिक रूप से पहचानी गई 189 संवेदनशील झीलों में से 56 झीलों को ‘वेरी हाई रिस्क’ (अति-संवेदनशील) श्रेणी में रखा गया है।
6. GLOF (ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड) क्या होता है?
जब ग्लेशियर के पिघलने से बनी प्राकृतिक झील का कच्चा किनारा (मोरेन) अधिक पानी के दबाव, भूकंप या हिमस्खलन के कारण अचानक टूट जाता है, तो नीचे की घाटी में लाखों क्यूसेक पानी प्रलय बनकर बहता है, जिसे GLOF कहते हैं।
7. हिमालय के कितने ग्लेशियरों की नियमित निगरानी की जा रही है?
हिंदू कुश हिमालय और काराकोरम रेंज में लगभग 40,000 ग्लेशियर हैं, लेकिन संसाधनों की कमी के चलते जमीनी स्तर पर केवल 21 ग्लेशियरों की ही निरंतर और विस्तृत निगरानी की जा रही है।
8. क्या इस ग्लेशियर संकट को पूरी तरह रोका जा सकता है?
वैश्विक उत्सर्जन में तत्काल कटौती, मैदानी इलाकों में ईंट-भट्ठों के आधुनिकीकरण से ब्लैक कार्बन पर नियंत्रण, और पहाड़ों में अनियंत्रित निर्माण कार्यों पर रोक लगाकर इसके नुकसान की गति को काफी हद तक धीमा किया जा सकता है।
9. हिमालयी जल प्रणालियों से कितने लोगों का जीवन जुड़ा है?
हिमालयी हिमनद प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से भारत, पाकिस्तान, चीन और नेपाल समेत दक्षिण और पूर्व एशिया के लगभग 2 अरब (200 करोड़) लोगों को जल और खाद्य सुरक्षा प्रदान करते हैं।
10. आम नागरिक के तौर पर हम हिमालय को बचाने में क्या मदद कर सकते हैं?
पहाड़ों पर जाते समय शून्य-प्लास्टिक नीति का पालन करें, स्थानीय वाहनों का सीमित उपयोग करें, ऊर्जा और पानी की बर्बादी रोकें और जलवायु जागरूकता बढ़ाने में योगदान दें।
अस्वीकरण (Disclaimer)
यह आलेख अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संगठनों (Systemiq, ICIMOD), भारतीय अनुसंधान संस्थानों (GB Pant Institute) की सार्वजनिक रिपोर्टों और अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसियों द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर जनहित व पर्यावरण जागरूकता के उद्देश्य से तैयार किया गया है। किसी भी यात्रा योजना या नीतिगत निर्णय से पूर्व कृपया भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय, केंद्रीय जल आयोग (CWC) और संबंधित राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों द्वारा जारी आधिकारिक परामर्श का संज्ञान लें।





























