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Home - Government Laws & Regulations - CJI सूर्यकांत की सख्ती: ‘मेरे रिटायरमेंट का इंतजार है?’ अरावली रिपोर्ट पर 30 नवंबर की डेडलाइन

CJI सूर्यकांत की सख्ती: ‘मेरे रिटायरमेंट का इंतजार है?’ अरावली रिपोर्ट पर 30 नवंबर की डेडलाइन

सुप्रीम कोर्ट ने अरावली हाई-पावर्ड कमेटी की 6 महीने की मोहलत ठुकराई और 30 नवंबर तक रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया।

Abhay Jeet Singh by Abhay Jeet Singh
08/09/2026
in Government Laws & Regulations
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CJI सूर्यकांत अरावली मामला

CJI सूर्यकांत अरावली मामला: SC ने दी 30 नवंबर की डेडलाइन

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CJI सूर्यकांत की सख्ती: ‘मेरे रिटायरमेंट का इंतजार है?’ अरावली रिपोर्ट पर 30 नवंबर की डेडलाइन

देश की राजधानी दिल्ली और उत्तर भारत को थार रेगिस्तान के विस्तार से बचाने वाली अरावली पर्वतमाला के अस्तित्व को लेकर सुप्रीम कोर्ट के गलियारे में अभूतपूर्व तल्खी देखने को मिली। अरावली की परिभाषा और अवैध खनन पर रोक लगाने के लिए गठित हाई-पावर्ड कमेटी (HPC) द्वारा 6 महीने की अतिरिक्त मोहलत मांगने की अर्जी पर देश की शीर्ष अदालत ने कड़ा रुख अपनाया। मामले की सुनवाई करते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की विशेष पीठ ने दो-टूक लहजे में सवाल दाग दिया—“क्या आप लोग मेरे रिटायरमेंट का इंतजार कर रहे हैं?”

CJI सूर्यकांत अरावली मामला अब उस निर्णायक मोड़ पर आ चुका है जहां शीर्ष अदालत किसी भी तरह की हीलाहवाली या नौकरशाही लेटलतीफी को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है। पीठ ने कमेटी की 28 फरवरी 2027 तक समय बढ़ाने की अर्जी को एक ही झटके में खारिज करते हुए स्पष्ट आदेश दिया कि कमेटी दिन-रात काम करे और हर हाल में 30 नवंबर तक अपनी अंतिम रिपोर्ट अदालत के पटल पर रखे।

शीर्ष अदालत ने चेतावनी भी दी कि यदि निर्धारित समय में काम पूरा नहीं किया गया, तो पूरी कमेटी को तुरंत भंग करके नए सिरे से पुनर्गठित कर दिया जाएगा। करोड़ों नागरिकों के फेफड़े माने जाने वाले अरावली के संरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का यह रुख यह दर्शाता है कि पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर समयसीमा का उल्लंघन अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

मुख्य बिंदु (Key Highlights)

  • 6 महीने की मोहलत सीधे खारिज: सुप्रीम कोर्ट ने अरावली हाई-पावर्ड कमेटी द्वारा 28 फरवरी 2027 तक मांगी गई 6 महीने की मोहलत की याचिका को सिरे से ठुकरा दिया।

  • CJI की कड़ी मौखिक टिप्पणी: चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) से कहा कि कमेटी ने कलम के पहले ही वार से मेरे रिटायरमेंट के बाद की तारीख मांग ली।

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  • 30 नवंबर की सख्त डेडलाइन: अदालत ने पांच सदस्यीय विशेषज्ञ कमेटी को निर्देश दिया कि वह दिन-रात काम करे और 30 नवंबर तक अपनी अंतिम रिपोर्ट अनिवार्य रूप से सौंपे।

  • कमेटी भंग करने की चेतावनी: पीठ ने साफ चेतावनी दी कि यदि दो महीने के भीतर कमेटी परिणाम देने में विफल रही, तो पूरे पैनल को पुनर्गठित कर नए विशेषज्ञ नियुक्त किए जाएंगे।

  • अंतरिम रिपोर्ट देने की छूट: अति-संवेदनशील और जरूरी कानूनी बिंदुओं पर अदालत ने पैनल को विषय-वार अंतरिम रिपोर्ट (Interim Reports) पेश करने की अनुमति दी ताकि जरूरी मामलों पर तुरंत फैसला हो सके।

  • जनजातीय व स्थानीय हितधारकों से संवाद: राजस्थान और गुजरात के स्थानीय आदिवासियों, ओरण (पवित्र उपवन) और ग्रामीणों के अधिकारों को ध्यान में रखते हुए व्यापक जनसुनवाई का निर्देश।

  • अगली सुनवाई 2 दिसंबर को: सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली विस्तृत सुनवाई 2 दिसंबर को तय की है।

ताजा घटनाक्रम: सुप्रीम कोर्ट के कोर्ट रूम में क्या हुआ?

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की विशेष पीठ के समक्ष जब अरावली पर्वतमाला के सीमांकन और संरक्षण संबंधी मामले की फाइल खुली, तो केंद्र सरकार की ओर से हाई-पावर्ड कमेटी का अनुपालन पत्र (Compliance Report) प्रस्तुत किया गया।

कमेटी का नेतृत्व कर रहीं भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE) की महानिदेशक कंचन देवी की ओर से अदालत को बताया गया कि अरावली की वैज्ञानिक जांच, भू-स्थानिक (Geospatial) मैपिंग, जैव विविधता, जल प्रणाली और हितधारकों के परामर्श के लिए 28 फरवरी 2027 तक का समय चाहिए।

इस पर सीजेआई सूर्यकांत भड़क उठे। उन्होंने याद दिलाया कि उनका न्यायिक कार्यकाल 9 फरवरी 2027 को समाप्त हो रहा है। चीफ जस्टिस ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, “इन्हें सीधे तौर पर मेरे रिटायरमेंट के बाद की तारीख मांगनी चाहिए थी। ऐसा लगता है कि कमेटी मेरे रिटायर होने का इंतजार कर रही है। हम इसकी इजाजत नहीं देंगे।”

अदालत ने आदेश लिखवाते हुए दर्ज किया कि कमेटी को कोई अतिरिक्त विस्तार नहीं मिलेगा और उसे 30 नवंबर तक ही अपना काम पूरा करना होगा।

बैकग्राउंड स्टोरी: आखिर क्यों उलझा है अरावली का मामला?

अरावली का विवाद केवल पत्थरों और पहाड़ियों का नहीं, बल्कि उत्तर भारत की जलवायु सुरक्षा का प्रश्न है। दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में लगभग 700 किलोमीटर तक फैली अरावली दुनिया की सबसे पुरानी वलित पर्वत श्रृंखलाओं (Fold Mountains) में से एक है।

विवाद की शुरुआत नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व फैसले से हुई थी, जिसमें केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की एक समिति की सिफारिश पर ‘अरावली पहाड़ी’ की एक तकनीकी परिभाषा स्वीकार कर ली गई थी। उस परिभाषा के तहत:

  1. केवल उसी भू-भाग को ‘अरावली पहाड़ी’ माना जाएगा जो आसपास की स्थानीय जमीन से कम से कम 100 मीटर ऊंची हो।

  2. ऐसी दो या अधिक पहाड़ियों के बीच यदि 500 मीटर से कम की दूरी होगी, तभी उसे ‘अरावली रेंज’ माना जाएगा।

पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों और नागरिक संगठनों ने इस परिभाषा पर जोरदार आपत्ति जताई। इस परिभाषा का सीधा मतलब यह था कि 100 मीटर से कम ऊंचाई वाले हजारों टीले, छोटी पहाड़ियां और हरित गलियारे अरावली के दायरे से बाहर हो जाते, जिससे वहां रियल एस्टेट माफिया और खनन कंपनियों को बेरोकटोक खुली छूट मिल जाती।

विवाद बढ़ता देख 29 दिसंबर 2025 को सीजेआई सूर्यकांत की पीठ ने अपने पुराने फैसले के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी (Keep in Abeyance) और खनन पट्टों के नवीनीकरण व नई मंजूरियों पर यथास्थिति (Status Quo) बहाल कर दी। इसके बाद मई 2026 में 5 सदस्यीय बहु-विषयक हाई-पावर्ड कमेटी बनाई गई थी, जिसे 31 अगस्त 2026 तक रिपोर्ट देनी थी।

रोचक तथ्य: अरावली पर्वतमाला थार मरुस्थल की पूर्व दिशा की ओर बढ़ती रेत के लिए एक प्राकृतिक दीवार (Green Barrier) का काम करती है। यदि अरावली खत्म हो जाए, तो दिल्ली, गुड़गांव, फरीदाबाद और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के उपजाऊ इलाके कुछ ही दशकों में बंजर मरुस्थल में तब्दील हो जाएंगे।

क्या हुआ खास? कमेटी की दलील और अदालत का पलटवार

कमेटी ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट में तर्क दिया कि अरावली को केवल ऊंचाई (Elevation) के पैमाने पर नहीं नापा जा सकता। इसमें वन, वन्यजीव गलियारे, भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) क्षेत्र, पवित्र उपवन (Orans) और जल ग्रहण क्षेत्र शामिल हैं। इसके लिए सैटेलाइट डेटा और फील्ड वेरिफिकेशन में समय लगेगा।

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने जो कानूनी दृष्टिकोण अपनाया, वह प्रशासनिक कार्यसंस्कृति पर बड़ा प्रहार है:

  1. लेबर ओवर एक्सक्यूज: अदालत ने कहा कि विशेषज्ञों को यदि समय कम लग रहा है, तो वे अतिरिक्त संसाधन लगाएं और दिन-रात काम करें। वैज्ञानिक अध्ययन की आड़ में अनिश्चितकाल तक नीतिगत अनिर्णय नहीं रखा जा सकता।

  2. समानांतर अंतरिम रिपोर्टिंग: CJI ने रास्ता निकालते हुए कहा कि यदि किसी विशिष्ट मुद्दे (जैसे खनन क्षेत्रों का सीमांकन या जनजातीय बस्तियां) पर तत्काल निर्णय की आवश्यकता है, तो कमेटी अलग से अंतरिम रिपोर्ट सौंप सकती है। लेकिन अंतिम रिपोर्ट 30 नवंबर से आगे नहीं जाएगी।

  3. कमजोर वर्गों की सुनवाई: अदालत ने विशेष रूप से ताकीद की कि राजस्थान और गुजरात के आदिवासी समुदायों की आजीविका और उनके अधिकारों को सुने बिना कोई भी एकतरफा रिपोर्ट अदालत स्वीकार नहीं करेगी।

एक्सपर्ट व्यू: सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ पर्यावरण वकीलों का मानना है कि CJI सूर्यकांत का यह कदम बेहद ऐतिहासिक है। अक्सर पर्यावरण से जुड़ी हाई-पावर्ड कमेटियां वर्षों तक समयसीमा बढ़वाती रहती हैं और इस बीच जमीनी स्तर पर भू-माफिया पहाड़ियों को समतल कर देते हैं। 30 नवंबर की सख्त समयसीमा तय होने से अधिकारियों और वैज्ञानिकों पर ठोस परिणाम देने की कानूनी बाध्यता आ गई है।

महत्वपूर्ण घटनाक्रम और सुनवाई का टाइम-टेबल (Mobile Friendly Table)

अरावली मामले के कानूनी सफर और आगामी महत्वपूर्ण तिथियों का सिलसिलेवार ब्योरा:

घटना / न्यायिक कदमनिर्धारित तिथि / समयकानूनी प्रभाव / न्यायालय का रुख
विवादास्पद परिभाषा पर रोक29 दिसंबर 2025100 मीटर ऊंचाई वाले फॉर्मूले पर तत्काल प्रभाव से रोक लगी।
हाई-पावर्ड कमेटी का गठन25 मई 2026ICFRE महानिदेशक की अध्यक्षता में 5 सदस्यीय पैनल बना।
मूल रिपोर्ट दाखिल करने की डेडलाइन31 अगस्त 2026समयसीमा समाप्त; कमेटी ने 6 महीने का अतिरिक्त समय मांगा।
समय विस्तार याचिका पर फैसला07 सितंबर 2026सुप्रीम कोर्ट ने 6 महीने की अर्जी खारिज की; CJI की तल्ख टिप्पणी।
अंतिम रिपोर्ट की अंतिम डेडलाइन30 नवंबर 2026कमेटी को हर हाल में अंतिम रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश।
सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई02 दिसंबर 2026अदालत अंतिम रिपोर्ट की समीक्षा कर दिशा-निर्देश तय करेगी।

महत्वपूर्ण नोट (Important Note): सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश के अनुसार, जब तक अरावली की अंतिम परिभाषा और संरक्षण योजना पर अंतिम मुहर नहीं लग जाती, तब तक अरावली क्षेत्र में किसी भी नए खनन पट्टे (Mining Leases) को मंजूरी नहीं दी जाएगी और न ही पुराने पट्टों का नवीनीकरण होगा।

पर्यावरण, आम नागरिकों और एनसीआर के निवासियों पर प्रभाव

अरावली का यह कानूनी संग्राम सीधे तौर पर करोड़ों आम नागरिकों के जीवन और स्वास्थ्य से जुड़ा है:

  1. दिल्ली-एनसीआर का प्रदूषण संकट: अरावली की पहाड़ियां उत्तर भारत में धूल भरी आंधियों को रोकती हैं और स्थानीय वर्षा के चक्र को नियंत्रित करती हैं। यदि पहाड़ियां टूटती रहीं, तो दिल्ली, नोएडा, गुरुग्राम और फरीदाबाद में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) का संकट कभी हल नहीं हो पाएगा।

  2. भूजल स्तर का पाताल में जाना: अरावली क्षेत्र की दरारयुक्त चट्टानें (Fractured Rocks) प्राकृतिक जल पुनर्भरण का काम करती हैं। अवैध खनन से जलस्तर सैकड़ों फीट नीचे जा चुका है। अदालत की सख्ती से जलस्रोतों को नया जीवन मिलने की उम्मीद बंधी है।

  3. स्थानीय आदिवासियों की सुरक्षा: राजस्थान के अरावली अंचलों में सदियों से निवास करने वाले भील और गरासिया आदिवासी समुदायों के जल, जंगल और जमीन के अधिकारों की रक्षा तभी संभव है जब अरावली की सीमाएं कानूनन सुरक्षित हों।

भविष्य का प्रभाव: 30 नवंबर के बाद क्या बदलेगा?

सुप्रीम कोर्ट की इस समयसीमा का असर केवल अदालत तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका दूरगामी असर दिखेगा:

  • प्रशासनिक जवाबदेही: सरकारी कमेटियों में तारीख पर तारीख लेने की संस्कृति पर अंकुश लगेगा। यदि 30 नवंबर तक रिपोर्ट नहीं आती, तो शीर्ष अदालत जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ अवमानना या कमेटी पुनर्गठन का कठोर कदम उठा सकती है।

  • खनन माफिया पर नकेल: हरियाणा और राजस्थान की सीमाओं पर सक्रिय अवैध स्टोन क्रशर और खनन माफियाओं के खिलाफ स्थानीय प्रशासन को सख्त कार्रवाई करनी होगी, क्योंकि अदालत की नजर सीधे उपग्रह चित्रों पर है।

  • एकीकृत अरावली प्रबंधन योजना (MPSM): पर्यावरण मंत्रालय को पूरे 700 किलोमीटर के कॉरिडोर के लिए एक स्थायी खनन और संरक्षण योजना लागू करनी होगी, जिससे विकास और पर्यावरण में संतुलन बन सके।

रीडर अलर्ट (Reader Alert): अरावली क्षेत्र में भूमि या फार्महाउस खरीदने की योजना बनाने वाले नागरिकों को अत्यंत सतर्क रहना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरावली की नई परिभाषा तय किए जाने के बाद गैर-वन घोषित अवैध निर्माणों पर बुलडोजर कार्रवाई और कानूनी शिकंजा कसना तय है।

नागरिकों, पर्यावरण प्रेमियों और पाठकों को क्या करना चाहिए?

यदि आप दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा या राजस्थान के निवासी हैं, तो पर्यावरण संरक्षण में आपकी भी सीधी भागीदारी आवश्यक है:

  1. अवैध खनन की सूचना दें: यदि आपके क्षेत्र में अरावली पहाड़ियों को काटने, अवैध बोरवेल लगाने या पेड़ों की कटाई का मामला दिखे, तो राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और वन विभाग के पोर्टल पर ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराएं।

  2. आधिकारिक अदालती फैसलों की पुष्टि करें: सोशल मीडिया पर चल रहे भ्रामक दावों से बचें। मामले की सटीक जानकारी के लिए सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर लिस्टिंग और आदेशों का अवलोकन करें।

  3. हरित क्षेत्र बढ़ाने में सहयोग: अरावली की तलहटी में स्थानीय प्रजातियों के पौधे (जैसे कीकर, ढाक, खेजड़ी और नीम) लगाने के सामुदायिक अभियानों से जुड़ें।

निष्कर्ष

CJI सूर्यकांत अरावली मामला भारतीय न्यायपालिका के उस दृढ़ संकल्प का प्रतीक बन गया है जहां न्याय की गति को प्रशासनिक ढिलाई का बंधक नहीं बनने दिया जा सकता। मुख्य न्यायाधीश की यह टिप्पणी कि “क्या मेरे रिटायरमेंट का इंतजार है?” व्यवस्था के उस ढीलेपन पर करारा तमाचा है जो अक्सर जटिल मामलों को वर्षों तक टालने का प्रयास करती है।

30 नवंबर की डेडलाइन तय करके सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि अरावली की हरियाली और पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा किसी भी नौकरशाही औपचारिकता से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। अब निगाहें हाई-पावर्ड कमेटी पर टिकी हैं कि वह किस तरह 2 दिसंबर की सुनवाई से पहले एक पुख्ता, वैज्ञानिक और लोक-कल्याणकारी रिपोर्ट तैयार करती है।

अरावली मामले से जुड़े आधिकारिक अदालती आदेशों, अंतरिम रिपोर्टों और केस की लाइव स्थिति के लिए सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के आधिकारिक पोर्टल (sci.gov.in) पर केस टाइटल ‘In Re: Definition of Aravalli Hills and Ranges’ का संदर्भ लें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1: CJI सूर्यकांत अरावली मामला मुख्य रूप से किस विवाद से जुड़ा है?

उत्तर: यह मामला अरावली पहाड़ियों और पर्वत श्रृंखला की एक समान वैज्ञानिक परिभाषा तय करने, 100 मीटर ऊंचाई वाले पुराने विवादित फॉर्मूले की समीक्षा करने और क्षेत्र में अवैध खनन पर रोक लगाने से जुड़ा है।

Q2: सुप्रीम कोर्ट ने हाई-पावर्ड कमेटी को कब तक रिपोर्ट देने का आदेश दिया है?

उत्तर: सुप्रीम कोर्ट की विशेष पीठ ने कमेटी की 6 महीने की विस्तार अर्जी खारिज करते हुए 30 नवंबर तक अंतिम रिपोर्ट दाखिल करने की सख्त समयसीमा (Deadline) निर्धारित की है।

Q3: चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान क्या तल्ख टिप्पणी की?

उत्तर: चीफ जस्टिस ने केंद्र सरकार के वकील से कहा कि कमेटी ने 28 फरवरी 2027 तक का समय मांगकर सीधे उनके रिटायरमेंट के बाद की तारीख मांगी है, ऐसा लगता है कि वे मेरे रिटायर होने का इंतजार कर रहे हैं, जिसे अदालत कतई स्वीकार नहीं करेगी।

Q4: अरावली हाई-पावर्ड कमेटी (HPC) की अध्यक्षता कौन कर रहा है?

उत्तर: इस 5 सदस्यीय बहु-विषयक विशेषज्ञ समिति की अध्यक्षता भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE) की महानिदेशक कंचन देवी कर रही हैं।

Q5: यदि कमेटी 30 नवंबर तक रिपोर्ट नहीं दे पाती है तो क्या होगा?

उत्तर: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि कमेटी निर्धारित दो महीनों में रिपोर्ट देने में असमर्थ रहती है, तो अदालत पूरी कमेटी को भंग कर नए विशेषज्ञों के साथ इसका पुनर्गठन करेगी।

Q6: अरावली की 100 मीटर वाली पुरानी परिभाषा पर विवाद क्यों था?

उत्तर: पर्यावरणविदों का तर्क था कि केवल 100 मीटर से ऊंची पहाड़ियों को अरावली मानने से सैकड़ों छोटे टीले और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील हरित क्षेत्र संरक्षण से बाहर हो जाते और खनन माफिया के शिकार बन जाते।

Q7: क्या इस मामले में स्थानीय आदिवासियों के अधिकारों का ध्यान रखा जाएगा?

उत्तर: जी हां, सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि कमेटी राजस्थान और गुजरात के आदिवासी समुदायों, स्थानीय ग्रामीणों और धार्मिक स्थलों (ओरण) से जुड़े सभी पक्षों से विचार-विमर्श करके ही रिपोर्ट तैयार करेगी।

Q8: सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई कब होगी?

उत्तर: मामले की अगली विस्तृत सुनवाई 2 दिसंबर को तय की गई है, जहां अदालत कमेटी द्वारा दाखिल अंतिम रिपोर्ट और अंतरिम रिपोर्टों की समीक्षा करेगी।

अस्वीकरण (Disclaimer)

यह समाचार विश्लेषण सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया में 7 सितंबर को हुई न्यायिक सुनवाई, आधिकारिक आदेश पत्र, केस टाइटल ‘In Re: Definition of Aravalli Hills and Ranges’ के कानूनी दस्तावेजों और प्रमाणित मीडिया रिपोर्टों पर आधारित है। मामले से जुड़े अंतिम कानूनी दिशा-निर्देशों और आदेशों के सत्यापन हेतु भारत के सर्वोच्च न्यायालय की आधिकारिक वेबसाइट (sci.gov.in) पर जारी आदेश की प्रति ही अंतिम रूप से मान्य होगी।

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Abhay Jeet Singh

Abhay Jeet Singh

Abhay Bharati Fast News में लेखक एवं संपादक के रूप में कार्यरत हैं। ये टेक्नोलॉजी, मनोरंजन, खेल और सामयिक घटनाओं से संबंधित विषयों पर समाचार लेखन और संपादन का कार्य करते हैं।इनकी जिम्मेदारी विश्वसनीय स्रोतों से जानकारी एकत्र करना, तथ्यों का सत्यापन करना तथा सामग्री की संपादकीय समीक्षा के बाद प्रकाशन सुनिश्चित करना है।भूमिका: Author & Editor – Bharati Fast News

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UP Digital Entrepreneur Scheme: 8,000 न्याय पंचायतों में बनेंगे डिजिटल उद्यमी, 50% महिलाएं

by Abhay Jeet Singh
सितम्बर 8, 2026
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